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देखभाल का कर्त्तव्य सर्जरी के साथ समाप्त नहीं होता है-एनसीडीआरसी ने दिया बाॅम्बे के अस्पताल व डाॅक्टरों को मृतक मरीज के परिवार को 31 लाख रुपए का भुगतान करने का आदेश [आर्डर पढ़े]

Live Law Hindi
19 July 2019 3:48 PM GMT
देखभाल का कर्त्तव्य सर्जरी के साथ समाप्त नहीं होता है-एनसीडीआरसी ने दिया बाॅम्बे के अस्पताल व डाॅक्टरों को मृतक मरीज के परिवार को 31 लाख रुपए का भुगतान करने का आदेश [आर्डर पढ़े]
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राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने दक्षिण मुम्बई में स्थित बाॅम्बे के एक अस्पताल को यह निर्देश दिया है कि अस्पताल द्वारा बरती गई लापरवाही के लिए एक मृतक मरीज के परिजनों को 30 लाख रुपए बतौर मुआवजा दिया जाए।

पलटा गया राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का फैसला
वहीं अस्पताल के डाॅक्टरों को यह निर्देश दिया गया है कि वह संयुक्त रूप से 1 लाख रुपए का भुगतान करे। अध्यक्ष आर. के. अग्रवाल और सदस्य एम. श्रीसा इस मामले में मृतक रणजीत तोरपानी के परिजनों की तरफ से अपील पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के आदेश को चुनौती दी गई थी। राज्य आयोग ने अस्पताल पर डाॅक्टरों के खिलाफ लगाए गए लापरवाही के आरोपों को खारिज कर दिया था।

क्या था यह पूरा मामला?
दरअसल 73 वर्षीय रणजीत तोरपानी का डाक्टर पी. बी. देसाई ने ऑपरेशन किया था। शिकायत पर सुनवाई के दौरान मरीज की मौत हो गई थी। तोरपानी को 26 जून 2004 को अस्पताल में भर्ती कराया गया था और कार्सिनोमा, जो एक प्रकार का कैंसर है, का ऑपरेशन हुआ था। मरीज को सर्जरी के लिए अस्पताल की तरफ सेे फिट करार दिया गया था।

फिजिशयन डाॅक्टर संजय वागले ने मरीज की पूरी हिस्ट्री को देखा था कि उसे क्या-क्या बीमारी है ओर किन-किन बीमारियों के लिए वह कौन-कौन सी दवाईयां ले रहा है। जिनमें क्रोनिक डिप्रेशन, आंख में मोतियाबिंद आदि भी शामिल था, जिनके लिए वह 20 साल से दवाईयां ले रहा था।

डाॅक्टर वागले ने मरीज की सभी दवाईयों और नुस्खों को देखा और उसको सर्जरी के लिए फिट करार दिया था। 28 जून 2004 को डाॅक्टर देसाई ने सर्जरी की थी। सर्जरी के बाद मरीज व उसके परिजनों को डाॅक्टर देसाई ने यह बताया था कि सर्जरी सफल रही है और मरीज को वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाएगा।

शिकायकर्ता के अनुसार जब मरीज और उसके परिजन, उसको वार्ड में शिफ्ट करने का इंतजार कर रहे थे, तभी उनको यह जानकर धक्का लगा कि मरीज को आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया है। जो अस्पताल के तीसरे तल पर था।

शिकायतकर्ता पंकज तोरपानी व उसके परिजनों को यह बताया गया कि मरीज के निरीक्षण के लिए उसे शिफ्ट किया गया है। मरीज को उस समय होश आया हुआ था और वह मानसिक तौर पर परेशान था। उसने सवाल किया कि उसे यहां क्यूं लाया गया है।

अगले दिन मरीज ने नींद न आने की शिकायत की और बताया कि उसके पेट के निचले हिस्से में और गले में दर्द है। उसको सांस लेने में दिक्कत हो रही है। जब मरीज के परिजन आईसीयू के बाहर उसका इंतजार कर रहे थे, तभी उन्होंने आईसीयू के अंदर हुए शोर के चलते झांक कर देखा तो पाया कि मरीज को सांस लेने में दिक्कत हो रही है और उसे कृत्रिम सांस दी जा रही है। डाॅॅक्टर देसाई की सहायक डाक्टर उस समय मरीज की देखरेख में थी। उसने मरीज के परिजनों को बताया कि मरीज को हार्ट अटैक आया है और उनको पुनर्जीवित किया गया है। जिसके बाद मरीज को वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया गया।

उस समय डाॅक्टर वागले वहां उपस्थित नहीं थे और इस घटना के लगभग 2.5 घंटे बाद यह निर्देश दिए गए कि मरीज को 12वें फ्लोर पर स्थित आईसीयू में शिफ्ट कर दिया जाए। परंतु वेंटिलेटर पर रखने के बाद मरीज को फिर होश नहीं आया।

वह 14 फरवरी 2.15 तक लगभग 8 महीने अस्पताल में रहा। जिसके बाद उसे घर ले आया गया और आक्सिजन के सहयोग पर रखा गया परंतु वह उस समय भी कोमा में था। जब परिजनों को डिस्चार्ज सारांश दिया गया तो उसमें भी लिखा था कि 'मरीज होश में नहीं है और निष्क्रियता की स्थिति में है'।

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का आदेश
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा श्रीमति सविता गर्ग बनाम निदेशक,राष्ट्रीय ह्दय संस्थान (2004) 8 एससीसी 56 के मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में यह सिद्धांत तय किया गया था कि यह अस्पताल की ड्यूटी है कि वह बताए कि मरीज़ के इलाज के संबंध में क्या प्रक्रिया अपनाई गई है और कोई निश्चित स्थिति क्यों पैदा हुई है।

आयोग ने कहा कि-
''इस मामले में अस्पताल व डाॅक्टरों की टीम को यह बताना था कि क्यों 'मंदनाडी' की स्थिति पैदा हुई। अस्पताल व इलाज करने वाले डाॅक्टरों का यह कहना था कि शिकायकर्ता ने सीटी स्कैन के लिए सहमति नहीं दी थी। इसलिए रोग का निर्णय नहीं हो पाया। न ही मामले में कोई एक्सपर्ट का सबूत पेश किया गया। जबकि मरीज को गंभीर स्थिति में अस्पताल में भर्ती कराया गया था इसीलिए शिकायतकर्ताओं ने सीटी स्कैन नहीं कराने दिया।''

आयोग ने शीर्ष कोर्ट द्वारा डाक्टर लक्ष्मण बालाकृष्णा जोशी बनाम डाक्टर टी.बाबू गोडबले एआईआर 1969 एससी 128 के मामले में दिए फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में एक चिकित्सा पेशेवर की ड्यूटी के बारे में बताया गया था-
1- एक चिकित्सा पेशेवर जब केस को अपने हाथ में लेने का निर्णय लेता है तो यह उसकी ड्यूटी बनती है कि वह इसके लिए सावधानी बरते।
2- क्या इलाज किया जाना है, उसके लिए भी यह उसकी ड्यूटी बनती है कि वह सावधानी बरते।
3- इलाज को करते समय भी सावधानी बरतने की उसकी ड्यूटी बनती है।

फैसले में यह कहा गया था कि अगर इनमें से कोई भी ड्यूटी वह पूरी नहीं करता है तो उसके खिलाफ मरीज के प्रति लापरवाही बरतने की कार्यवाही की जा सकती है।

"अस्पताल और डॉक्टरों ने बरती लापरवाही"
इस मामले में हमारा मानना है कि मरीज को जो इलाज दिया गया है, उसको देने के तरीके व समय के मामले में लापरवाही बरती गई है। जिस तरीके से मरीज को तीसरे तल पर स्थित आईसीयू से 12वें फलोर पर स्थित आईसीयू में भेजा गया था। वहीं मंदनाडी के बारे में कुछ नहीं बताया गया। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने सविता गर्ग मामले में जो तरीका बताया था, उसे उस तरीके से दर्ज नहीं किया गया। न ही यह बताया गया कि आईसीयू में सुबह 9 बजे से 10:30 बजे तक मरीज को क्या इलाज दिया गया। इसलिए राज्य आयोग के फैसले को रद्द किया जा रहा है।

आयोग ने कहा कि-
''इस बात को ध्यान में रखते हुए कि मरीज 8 महीने तक अस्पताल में रहा था और लगभग 3 साल तक कोमा में रहा। उसके इलाज के खर्च के बिल के अनुसार 16,93,010 रुपए खर्च आया, जिसमें मेडि-क्लेम से मिले 3,75,000 रुपए शामिल नहीं है। जबकि डिस्चार्ज किए जाने के बाद भी खर्च हुआ है, जब मरीज कोमा में था। वहीं मरीज के परिजनों को मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ा। मरीज की उम्र व अन्य तथ्यों को देखते हुए, हमारा यह मानना है कि अस्पताल 30 लाख रुपए मरीज के परिजनों को देना होगा, ताकि उनको न्याय मिल सके। इसके अलावा दोनों डाॅक्टर को मिलकर 1लाख रुपए का हर्जाना देना होगा क्योंकि आयोग का यह मानना है कि देखभाल की ड्यूटी सर्जरी के साथ खत्म नहीं होती है।"

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