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सिर्फ इस वजह से कि परिसंपत्ति वक्फ़ के अधीन है, वह दीवानी अदालत के सीमाक्षेत्र से बाहर नहीं हो जाती : बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
13 Dec 2019 3:15 AM GMT
सिर्फ इस वजह से कि परिसंपत्ति वक्फ़ के अधीन है, वह दीवानी अदालत के सीमाक्षेत्र से बाहर नहीं हो जाती : बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि वक्फ़ अधिनियम की परिसंपत्ति से जुड़े मामले में दीवानी अदालतों पर रोक इस अधिनियम की धारा 6(5), 7 और 85 से आगे नहीं जाएगी।

हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ के न्यायमूर्ति आरवी घुगे नांदेड़ जिले के 75 वर्षीय सैयद अब्दुल्लाह की याचिका पर गौर कर रहे थे, जब यह मुद्दा उठा कि अगर कोई मामला वक्फ़ की परिसंपत्ति पर रोक से सिर्फ जुड़ा है तो क्या दीवानी अदालत इस मामले की सुनवाई कर सकती है या नहीं?

यवतमाल जिले के 78 वर्षीय राजेश्वर देशपांडे के मामले में एक प्रतिवादी के रूप में याचिकाकर्ता ने यह आपत्ति उठाई थी। इस आधार पर निचली अदालत ने क्षेत्राधिकार का एक प्राथमिक मुद्दा बनाया और सीपीसी के आदेश XIV के तहत इस पर फैसला सुनाया। चूंकि विवादित परिसंपत्ति वक्फ की है, 11 जून 2018 को निचली अदालत ने कहा कि इस मामले पर वह गौर कर सकती है, इसलिए अब्दुल्लाह ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ एक रिट याचिका दायर की।

अदालत ने इस मामले में अजय देशपांडे को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया। देशपांडे ने इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के अब तक के फैसले का हवाला दिया -

1) रमेश गोबिंदाराम (मृत) बनाम सुगर हुमांयू मिर्ज़ा वक्फ

2) बोर्ड ऑफ़ वक्फ, पश्चिम बंगाल और अन्य बनाम अनीस फातमा बेगम एवं अन्य

3) लाल शाह बाबा दरगाह ट्रस्ट बनाम मैग्नम डेवलपर्स एवं अन्य

4) पंजाब वक्फ बोर्ड बनाम शाम सिंह हरिके

रमेश गोबिंदराम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वक्फ अधिनियम की धारा 85 ने जो अवरोध खड़े किये हैं, धारा 83 के साथ पढ़ने पर यह अधिनियम की धारा 6 (5), 7 और 85 की सीमा से आगे दीवानी अदालत को नहीं रोक पाएंगे।

एमिकस क्यूरी ने जिन फैसलों का हवाला दिया है, उनका जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति घुगे ने कहा :

"इसलिए, यह निष्कर्षतः अगर मामला वक्फ अधिनियम की धारा 6(1), जिसे 6(5) के साथ पढ़ा जाए, के अधीन आता है तो दीवानी अदालत उस पर गौर नहीं कर सकती और कोई भी मामला जिस पर कोई निर्णय धारा 6(1) के तहत है, सिर्फ वक्फ ट्रिब्यूनल ही उसकी सुनवाई कर सकता है और दीवानी अदालत के क्षेत्राधिकार को तब नजरअंदाज किया जाएगा।"

अदालत ने एमिकस क्यूरी की इस दलील को मान लिया कि क़ानून यह नहीं मानता कि जैसे ही किसी मामले में वक्फ की कोई परिसंपत्ति जुड़ी हुई है, दीवानी अदालत की भूमिका समाप्त हो जाती है। सिर्फ इस वजह से कि मामला वक्फ की परिसंपत्ति से जुड़ा है, दीवानी अदालत की भूमिका समाप्त नहीं हो जाएगी, अदालत ने कहा। अदालत ने निष्कर्षतः कहा कि निचली अदालत का फैसला सही था और उसने याचिका खारिज कर दी।

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