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आपराधिक ट्रायल में बरी होने का ये मतलब ये नहीं कि अनुशासनात्मक कार्यवाही से निकले कदाचार से भी छोड़ दिया जाए : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
23 July 2019 1:20 PM GMT
आपराधिक ट्रायल में बरी होने का ये मतलब ये नहीं कि अनुशासनात्मक कार्यवाही से निकले कदाचार से भी छोड़ दिया जाए : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने यह दोहराया है कि आपराधिक मुकदमे के दौरान बरी होने का ये आधार नहीं है कि किसी को अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान सामने आए कदाचार से भी मुक्त कर दिया जाए।

क्या था यह पूरा मामला ?

दरअसल CRPF के एक कांस्टेबल पर यह आरोप लगाया गया था कि उसके द्वारा हथियार को संभालने के दौरान सह कर्मचारी की मौत हुई थी। अनुशासनात्मक जांच में यह पाया गया कि रिकॉर्ड पर सबूतों के आधार पर उसके खिलाफ कदाचार का आरोप जारी रह सकता है जबकि उसके खिलाफ IPC की धारा 304 के तहत अपराध का ट्रायल चला था जिसमें उसे बरी कर दिया गया।

HC द्वारा जवान को आरोप से बरी करते हुए दिया गया तर्क

अनुशासनात्मक जांच के निष्कर्षों के खिलाफ चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि चूंकि विभागीय कार्यवाही के साथ-साथ आपराधिक मामला "समान" था, इसलिए आपराधिक मामले से प्रतिवादी के बरी होने के बाद विभागीय कार्यवाही टिकाऊ नहीं थी। हाईकोर्ट ने कैप्टन एम. पॉल एंथोनी बनाम भारत गोल्ड माइंस लिमिटेड के फैसले पर भरोसा किया।

उक्त निर्णय में यह निर्धारित किया गया था कि विभागीय कार्यवाही में प्रमाण के मानक संभाव्यता में से एक है जबकि एक आपराधिक मामले में अभियोजन पक्ष द्वारा उचित संदेह से परे आरोप साबित किया जाना होता है। थोड़ा अपवाद यह हो सकता है कि जहां विभागीय कार्यवाही और आपराधिक मामला तथ्यों के एक ही सेट पर आधारित हो और दोनों कार्यवाही में साक्ष्य एक जैसे ही हों।

अपील में SC द्वारा दिया गया तर्क
अपील में न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की शीर्ष अदालत की पीठ ने यह कहा :

"एक अनुशासनात्मक जांच को सबूत के एक मानक द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जो एक आपराधिक मामले से अलग है। एक आपराधिक परीक्षण में बोझ उचित संदेह से परे आरोप स्थापित करने के लिए अभियोजन पक्ष पर निहित होता है। एक अनुशासनात्मक जांच का उद्देश्य नियोक्ता को यह निर्धारित करने के लिए सक्षम करना है कि क्या किसी कर्मचारी ने सेवा नियमों का उल्लंघन किया है।"
"तथ्य यह है कि पहले प्रतिवादी को आपराधिक मुकदमे के दौरान बरी कर दिया गया था, लेकिन ये कदाचार की जांच का आधार खत्म नहीं करता जो अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान सामने आ चुका है।"

उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द करते हुए बेंच ने आगे कहा :

"यह निस्संदेह सही है कि आपराधिक मुकदमे में आरोप उस घटना के दौरान एक सह-कर्मचारी की मृत्यु से उत्पन्न हुआ, जिसे परिणामस्वरूप गोली लगी थी, जो उस हथियार से हुआ जो बल के सदस्य के रूप में पहले प्रतिवादी को सौंपी गई थी।लेकिन कदाचार का आरोप अपने हथियार को संभालने में पहले प्रतिवादी की लापरवाही के आधार पर है और हथियार को संभालने के तरीके के संबंध में विभागीय निर्देशों का पालन करने में उसकी विफलता है। आपराधिक मामले में अनुशासनात्मक जांच के दौरान जो जुर्माना लगाया गया था, उसे रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता है।"


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