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कलकत्ता हाईकोर्ट ने उस दंडाधिकारी को किया बहाल,जो अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त थे,खुद पर लगाया एक लाख रुपए हर्जाना [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
20 July 2019 2:14 PM GMT
कलकत्ता हाईकोर्ट ने उस दंडाधिकारी को किया बहाल,जो अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त थे,खुद पर लगाया एक लाख रुपए हर्जाना [निर्णय पढ़े]
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अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त एक न्यायिक अधिकारी को फिर से नौकरी पर रखते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट को यह निर्देश दिया है कि वह इस अधिकारी को 1 लाख रुपए मुआवजे के तौर पर दे।

क्या था यह पूरा मामला?
दरअसल मिंटू मलिक के पास न्यायिक दंडाधिकारी और रेलवे दंडाधिकारी, सियालदाह के 2 पद थे। 7 मई 2007 को वह जब ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। तभी स्थानीय लोगों ने उनको बताया कि ट्रेन अक्सर देरी से चलती है। उन्हें बताया गया था कि इस तरह से ट्रेन के देर से चलने का कारण, ट्रेन का न्यू अलीपुर स्टेशन के बाद कहीं अवैध रूप से रुकना होता है। जिस समय ट्रेन से कंट्राबेंड मैटेरियल को उतारा जाता है, उस समय ड्राईवर और गार्ड, तस्करों के साथ यह खेल खेलते हैं ताकि अवैध व्यापार को सुविधाजनक बनाया जा सके।

मलिक ने मामले में किया हस्तक्षेप
मलिक ने इसके बाद मामले में हस्तक्षेप किया और ड्राईवर से बात की। जब वह उसके जवाबों से संतुष्ट नहीं हुए तो उन्होंने रेलवे पुलिस को यह निर्देश दिया कि वह इस बात को सुनिश्चित करें कि ट्रेन के ड्राईवर व गार्ड को रेलवे दंडाधिकारी की कोर्ट में पेश किया जाए।

रेलवे दंडाधिकारी की कोर्ट के समक्ष पी. के. सिंह नामक एक कर्मचारी के साथ रेलवे के कुछ कर्मचारी नारेबाजी कर रहे थे और रेलवे दंडाधिकारी के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे थे। इतना ही नहीं उन्होंने कोर्ट के कामकाज को भी प्रभावित किया। इसलिए आर. के. सिंह को हिरासत में ले लिया गया और उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 228 के तहत केस शुरू कर दिया गया।

हाई कोर्ट ने मलिक पर किए आरोप तय
बाद में हाईकोर्ट ने मलिक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू कर दी और उनके खिलाफ आरोप तय कर दिए गए। उन पर पहला आरोप यह था कि एक न्यायिक अधिकारी ने मोटरमैन कैबिन में अवैध रूप से यात्रा की और इसके लिए वह उस कैबिन में जबरन घुसे थे। जबकि मोटरमैन ने उनको ऐसा करने से रोका भी था। न्यायिक अधिकारी नियमित तौर पर इस तरह की यात्रा करने के आदि थे, जबकि उनको पता था कि मोटरमैन कैबिन में यात्रा करना अवैध है।

मलिक पर लगाया गया दूसरा आरोप
उन पर दूसरा आरोप यह था कि न्यायिक अधिकारी ने ट्रेन के देरी से चलने के कारणों के संबंध में ड्राईवर से पूछताछ करते समय उन्होंने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया। न्यायिक अधिकारी ने मोटरमैन और गार्ड पर ट्रेन के देरी से चलने के संबंध में रिपोर्ट देने का दबाव ड़ाला। वहीं न्यायिक अधिकार के अनाधिकृत मौखिक निर्देश पर ड्राईवर और गार्ड को रेलवे पुलिस स्टेशन ले जाया गया और उसके बाद रेलवे दंडाधिकारी की कोर्ट में पेश किया गया। जिसके चलते रेलवे कर्मचारियों ने उपद्रवी प्रदर्शन किया और इस कारण से उस दिन सुबह 11ः45 मिनट से शाम को 3ः45 मिनट तक सियालदाह डिविजन पर रेल की अवाजाही प्रभावित हुई।

अनिवार्य रूप से किया गया सेवानिवृत
अंत में अधिकारी को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत करने का दंड दे दिया गया। मलिक ने 1 सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष इस आदेश को चुनौती दी, परंतु उसने मलिक की याचिका को खारिज कर दिया।

पीठ ने उनकी सजा को पाया अनुपयुक्त
2 सदस्यीय पीठ ने उनकी याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि अनुशासनात्मक कमेटी ने उसे जिन आरोपों में दोषी पाया है, वो सही नहीं है। इसलिए उनको दी गई सजा भी अनुपयुक्त है, भले ही उन पर लगाए गए आरोप सही पाए जाते।

कोर्ट ने कहा कि-
"इस बात में कोई संदेह नहीं है कि उस दिन याचिकाकर्ता मोटरमैन के केबिन में घुसा था, परंतु ऐसा करने के पीछे उनका एक उद्देश्य था। इस बात का सबूत याचिकाकर्ता के कई बयानों से मिला है। वह उसका समाधान करना चाहता था जो कथित तौर पर सूचना मिली थी। क्या यह एक अनुभवहीन न्यायिक अधिकारी का उल्लास था या उनकी उम्र की बेगुनाही, जिसने उसे यह कल्पना करने के लिए प्रेरित किया वह अस्वस्थता की व्यवस्था से छुटकारा पा सकता है, अपीलकर्ता ने यह सोचा कि बतौर रेलवे दंडाधिकारी यह मामला उसके न्यायिक अधिकार की सीमा के भीतर है।''

यह अपीलकर्ता के पक्ष में गलत हो सकता है कि उसने अपने न्यायिक कार्यालय का उपयोग उसे सही करने के लिए किया जो सार्वजनिक रूप में गलत था। वास्तव में अधिकांश भारतीय ऐसे मामलों को दूसरे तरीके से देखते है, यहां तक कि जब उनकी उपस्थिति में अपराध किया जाता है या कोई गलत काम किया जाता है, कि ऐसा न हो कि कहीं वे भी किसी परिहार्य अदालती कार्यवाही में घसीटे जाएं। इस नासमझ न्यायिक अधिकारी ने सोचा कि वह अकेले तस्कर माफिया से निपट लेगा।''

''रेलवे दंडाधिकारी की कोर्ट में रेलवे कर्मियों द्वारा की गई बेइज्जती और मिली धमकी के लिए हाईकोर्ट से इस न्यायिक अधिकारी को संरक्षण तो मिला नहीं, जबकि यह रेलवे दंडाधिकारी था जो सार्वजनिक तौर पर हो रहे गलत कार्य को ठीक करने के प्रयास में खुद पीड़ित बन गया। किसी स्तर पर याचिकाकर्ता ने हो सकता है अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया हो, परंतु प्राथमिक रिपोर्ट से भी पता चलता है कि याचिकाकर्ता का कोई गलत इरादा नहीं था या उसकी कोई गलत भावना नहीं थी। प्राथमिक रिपोर्ट में इस बारे में सबकुछ साफ है। जांच की रिपोर्ट इसी प्राथमिक रिपोर्ट का समर्थन करती है। इतना ही नहीं अनुशासनात्मक अधिकारी को भी इस बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं मिला कि याचिकाकर्ता ने दुर्भावना के चलते ऐसा किया था।''

कोर्ट ने बहाल की अधिकारी की नौकरी एवं लाभ
कोर्ट ने यह आदेश दिया है कि इस अधिकारी को वापिस नौकरी पर रखा जाए और इसकी सेवाओं को बिना किसी रोक के निरंतर माना जाए। उन्हें वह सभी लाभ व प्रमोशन दिए जाए, जिनके यदि उनके खिलाफ यह अनुशासनात्मक कार्यवाही न की जाती तो वे हकदार होते। इतना ही नहीं उन्हें उनके वेतन का 75 प्रतिशत भी दिया जाए, जो वह नौकरी पर रहते हुए अर्जित करते।

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