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मराठों को आरक्षण वैध : जानिए क्या है मराठा आरक्षण पर कोर्ट का फ़ैसला [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
30 Jun 2019 3:38 PM GMT
मराठों को आरक्षण वैध : जानिए क्या है मराठा आरक्षण पर कोर्ट का फ़ैसला [निर्णय पढ़े]
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने मराठा समुदाय को आरक्षण दिए जाने को वैध ठहराया पर 16% आरक्षण देने के सरकार के निर्णय को नहीं माना। इसके बदले कोर्ट ने इस समुदाय को रोज़गार में 12% और शिक्षा संस्थानों में 13% आरक्षण की ही अनुमति दी।

कोर्ट का यह फ़ैसला कुल 487 पृष्ठ का है जिसे न्यायमूर्ति रंजीत मोरे ने लिखा है।

मराठा समुदाय के बारे में कोर्ट ने कहा :

"यद्यपि इस समुदाय को बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त है, पर कई रेपोर्टों और न्यायमूर्ति गायकवाड़ की रिपोर्ट में भी कहा गया है भारी संख्या में मराठों को अभी भी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।

गोखले इंस्टिच्यूट ऑफ़ इकोनोमिक्स ने जो शोध कार्य किए हैं उसके मुताबिक़ आत्महत्या करने वाले कुल किसानों में 40% मराठा थे जो यह बताता है कि राज्य कृषि संकट से जूझ रहा है और चूँकि अधिकांश मराठा खेती-किसानी करते हैं, यह समुदाय गंभीर वित्तीय संकट झेल रहा है। उक्त स्थिति के पृष्ठभूमि में इस समुदाय के युवा अपनी प्रगति और शहरों की ओर जाने के लिए आरक्षण को इसका हल मानते हैं और इसी वजह से युवाओं ने इसकी माँग के समर्थन में अपनी आवाज़ उठाई है"।

हालाँकि,

"राज्य में इस माँग पर मिश्रित प्रतिक्रिया हुई और अन्य पिछड़ी जातियों ने इसका यह कहते हुए विरोध किया कि अगर इन्हें आरक्षण दिया गया तो इससे आरक्षण में उनकी हिस्सेदारी पर असर पड़ेगा और फिर सामान्य वर्ग के लोग भी हैं जिनको यह डर सता रहा है कि प्रतिभा को नज़रंदाज़ किया जाएगा। जो स्थितियाँ बन रही हैं वह हमें यह सोचने के लिए मजबूर कर रहा है कि संविधान के निर्माताओं ने जाति के विनाश के लिए जो लड़ाई लड़ी थी क्या वह लड़ाई हम हार चुके हैं"।

अदालत ने इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला दिया और कहा कि पिछड़ी जाति की पहचान का फ़ैसला राज्य द्वारा नियुक्त उचित प्राधिकरण पर छोड़ दिया गया है।

"शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि पिछड़े वर्गों की पहचान का ऐसा कोई तय तरीक़ा नहीं है और इसका तरीक़ा बताने वाला कोई क़ानून भी नहीं है। शीर्ष अदालत ने आगे कहा कि राज्य द्वारा नियुक्त अथॉरिटी की यह ज़िम्मेदारी है कि वह नागरिकों में पिछड़े वर्गों की पहचान करे और इसके लिए ऐसा तरीक़ा ढूँढे जो उचित है"।

अपने फ़ैसले में कोर्ट ने कहा,

"…मराठा समुदाय में सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन के निर्धारण के लिए आयोग ने 26 समकालीन मानदंडों पर ग़ौर किया और उन्हें प्रश्नावलियों में शामिल किया"।

मराठा समुदाय में विभिन्न तरह के पिछड़ेपन की पहचान महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (MSBCC) ने किया और 1035 पृष्ठ की रिपोर्ट सौंपी।

पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की सीमा के 50% से अधिक नहीं होने की बात पर अदालत ने कहा,

"आरक्षण के 50% की सीमा के आगे बढ़ने पर कोई रोक नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 15 और 16 और विशेषकर अनुच्छेद 15(4) और 16(4) सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति को संभव बनाने वाले प्रावधान हैं और इस संदर्भ में राज्य के इस अधिकार पर न्यायिक समीक्षा की सीमित पाबंदी है ताकि राज्य की सच्चाई की जाँच की जा सके।

इसलिए हमारा यह मानना है कि अतिरिक्त आरक्षण को सही ठहराने का बोझ राज्य पर है क्योंकि सभी श्रेणियों के लिए 50% आरक्षण की यह सीमा बड़ी नहीं है। जैसा कि जीवन रेड्डी ने अपने फ़ैसले में कहा कि आरक्षण कुल जनसंख्या में पिछड़े वर्ग की संख्या के अनुपात और सरकारी सेवाओं में उनके प्रतिनिधित्व पर निर्भर करता है। अब तक यह भी स्थापित हो चुका है कि पिछड़ापन एक सापेक्ष शब्द है और इसे देश या राज्य की संपूर्ण जनसंख्या की आम उन्नति के स्तर के संदर्भ में देखा जाना चाहिए…और इसलिए पिछड़ेपन के निर्धारण का कार्य संबंधित राज्य पर छोड़ देना चाहिए"।

अंत में अदालत ने निष्कर्षतः कहा कि 16% का आरक्षण उचित नहीं है-

"सरकार का आरक्षण के प्रतिशत के बारे में (आयोग) के सुझावों को नहीं मानना और समुदाय के लिए 16% आरक्षण की अनुशंसा सही नहीं है जो कि आयोग के सुझाव से अधिक है"।

अदालत के आदेश इस तरह से थे -

[1] राज्य के पास शैक्षिक संस्थानों और सार्वजनिक सेवाओं में आरक्षण देने के लिए महाराष्ट्र राज्य आरक्षण अधिनियम, 2018 को पास करने का अधिकार है और यह किसी भी तरह संविधान (102वें संशोधन) अधिनियम 2018 से प्रतिबंधित नहीं है।

[2] हम निष्कर्षतः यह कहते हैं कि न्यायमूर्ति गायकवाड़ की अध्यक्षता में एमएसबीसीसी ने जो रिपोर्ट दी है वह क्वांटिफिएबल और समसामयिक आँकड़ों पर आधारित है और उसने निष्कर्षतः यह स्थापित किया है कि मराठा समुदाय सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा है और यह भी कि राज्य की सेवाओं में उनका प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है। इस तरह, हम एमएसबीसीसी की रिपोर्ट को सही मानते हैं।

[3] हम मानते हैं कि मराठा समुदाय को "सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग" बताना अनुच्छेद 14 के तहत वर्गीकरण की दो जाँचों पर खड़ा उतरता है।

[4] हम यह मानते हैं कि आरक्षण का स्तर 50% से ज़्यादा नहीं होना चाहिए पर विशेष परिस्थितियों और अप्रत्याशित स्थितियों में यह सीमा बढ़ सकती है।

[5] हम यह घोषित करते हैं कि गायकवाड़ आयोग की रिपोर्ट ने यह निर्धारित किया है कि यह अप्रत्याशित स्थिति है और आरक्षण का प्रतिशत 50 से ऊपर जा सकता है।

[6] हम यह घोषित करते हैं कि राज्य सरकार को अनुच्छेद 15(4)(5) और 16(4) के तहत एमएसबीसीसी की रिपोर्ट के आधार पर मराठा समुदाय के लिए अलग आरक्षण देने का अधिकार है।


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