Top
Begin typing your search above and press return to search.
मुख्य सुर्खियां

रिटायर हो जाने का मतलब यह नहीं कि काम पर रहते हुए जो ग़लतियाँ की उसके लिए कार्रवाई नहीं होगी; बॉम्बे हाईकोर्ट ने रिटायर हुए जज को राहत देने से मना किया [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
19 Jun 2019 5:11 AM GMT
रिटायर हो जाने का मतलब यह नहीं कि काम पर रहते हुए जो ग़लतियाँ की उसके लिए कार्रवाई नहीं होगी; बॉम्बे हाईकोर्ट ने रिटायर हुए जज को राहत देने से मना किया [निर्णय पढ़े]
x

बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि अगर कोई कर्मचारी रिटायर हो जाता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि नौकरी में रहते हुए उसने अगर कोई ग़लती की है तो अथॉरिटी उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं कर सकते हैं।

न्यायमूर्ति आरएम बोर्डे और न्यायमूर्तिएनजे जमदार ने रिटायर हुए एक पूर्व न्यायिक अधिकारी को कोई भी राहत देने से मना कर दिया। जज का दर्जा ज़िला जज का था और उन्होंने अपने ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई को जारी रखने को चुनौती दी है।

पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता जूनियर डिविज़न में दीवानी जज के कैडर में 7 सितम्बर 1992 में प्रवेश लिया। अक्टूबर 2011 में उनको ज़िला जज के रूप में प्रोन्नति दी गई। अक्टूबर 2016 में याचिकाकर्ता को राष्ट्रीय राजमार्ग अधिकरण का पीठासीन अधिकारी बनाया गया। उन्होंने 25 अक्टूबर 2016 को बॉम्बे हाईकोर्ट से इस पद पर ज्वाइन करने के लिए अनुमति माँगी।

याचिकाकर्ता के अनुसार, रजिस्ट्रार जनरल से उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला और 3 दिसम्बर 2016 को उन्होंने स्वैच्छिक अवकाश के लिए आवेदन दिया। इस बीच 7 दिसम्बर 2016 को हाईकोर्ट के प्रशासनिक प्रभाग ने उनके ख़िलाफ़ महाराष्ट्र सिविल सर्विसेज़ (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1979 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का निर्णय लिया।

सरकारी निर्णय के द्वारा 13 जनवरी 2017 को स्वैच्छिक अवकाश के उनके आवेदन को स्वीकार कर लिया गया पर इस शर्त के साथ कि उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई जारी रहेगी।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी। हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने 11 सितम्बर 2017 को उनकी याचिका ख़ारिज कर दी और कहा कि याचिकाकर्ता ने ख़ुद ही इन शर्तों को माना है और इसी वजह से उन्होंने अपना चार्ज सौंप दिया।

याचिकाकर्ता ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी याचिका ख़ारिज कर दी और आदेश दिया कि उनके ख़िलाफ़ जाँच को इस आदेश की तिथि से छह माह के भीतर पूरी की जाए।

अंत में याचिकाकर्ता ने अपने ख़िलाफ़ कार्रवाई को जाँच अधिकारी के समक्ष चुनौती दी जिन्होंने इसे हाईकोर्ट जैसी दलील देते हुए अस्वीकार कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने दुबारा इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में आवेदन दिया।

फ़ैसला

आरएस आपटे ने याचिकाकर्ता की पैरवी की जबकि अमित बोरकर ने हाईकोर्ट की पैरवी की तथा राज्य की पैरवी एजीपी केआर कुलकर्णी ने किया।

अदालत ने हाईकोर्ट की 11 सितम्बर 2017 की दलील पर ग़ौर करते हुए कहा,

"खंडपीठ ने इस बात पर ग़ौर किया कि याचिकाकर्ता रिटायर हो गई हैं और अनुशासनात्मक कार्रवाई से अधिक से अधिक यह होगा कि पेंशन नियम, 1982 के नियम 27 के तहत उनकी पेंशन रोकी जा सकती है। इस तरह खंडपीठ ने कर्मचारी-नियोक्ता संबंधों के टूटने के परिणाम के पक्ष पर ग़ौर किया है।

हमारी राय में, याचिकाकर्ता को जाँच अधिकारी के पास नहीं जाना चाहिए था और न ही बाद में इस अदालत के समक्ष। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि याचिकाकर्ता ने ख़ुद ही स्वैच्छिक रूप से रिटायर होने के आदेश को स्वीकार किया है जिसके साथ अनुशासनात्मक कार्रवाई की यह शर्त जुड़ी हुई थी"।

अंत में कोर्ट ने कहा, "पेंशन प्राप्त करने का एक आधार यह है कि कर्मचारी का आचरण अच्छा होगा और अगर पेंशनप्राप्तकर्ता को दुराचरण या सेवा के दौरान अपने कर्तव्यों की उपेक्षा का दोषी पाया जाता है तो उसका पेंशन रोका जा सकता है या उसे वापस लिया जा सकता है/ इसलिए किसी कर्मचारी का रिटायर हो जाने का मतलब यह नहीं है कि नौकरी की अवधि के दौरान उसके दुराचरण के लिए उसके ख़िलाफ़ नियुक्तिकर्ता अथॉरिटी कोई कार्रवाई नहीं करेगा। पर इस कार्रवाई की प्रकृति पेंशन को रोकने या उसको वापस लेने तक ही सीमित हो सकती है।"

अदालत ने यह कहते हुए याचिका ख़ारिज कर दी।


Next Story