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सुनवाई शुरू होने के बाद एक मुविक्कल को जज पर '' कथित पूर्वग्रह या पक्षपाती'' होने के लिए सवाल उठाने या संदेह करने की अनुमति नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट [आर्डर पढ़े]

Live Law Hindi
17 May 2019 10:49 AM GMT
सुनवाई शुरू होने के बाद एक मुविक्कल को जज पर  कथित पूर्वग्रह या पक्षपाती होने के लिए सवाल उठाने या संदेह करने की अनुमति नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट [आर्डर पढ़े]
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अपने आदेश में हर्ष मंदर की याचिका को खारिज करते हुए,जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को असम डिटेंशन सेंटर के मसमलों की सुनवाई से हटाने की मांग की गई थी,सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक मुविक्कल को इस बात की अनुमति नहीं दी जा सकती है कि कोर्ट की सुनवाई के आधार पर वह एक जज पर 'कथित पूर्वग्रह या पक्षपाती' होने के लिए सवाल उठाए या संदेह करे।

भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि-
''ऐसा करने से, पक्षकारों को जज बदलने की मांग करने के लिए उकसाने जैसा होगा। वह इस उम्मीद में जज को बदलने की मांग करेंगे कि कोई और उनके साथ सहमत होगा और विपरीत विचार नहीं लेगा। सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों को इस तरह से चुनना सीधे न्याय प्रशासन के साथ हस्तक्षेप करेगा।''
पीठ ने कहा कि-
हर्ष मंदर ने अपनी अर्जी में जिन तथ्यों को आधार बनाकर मुख्य न्यायाधीश को पीठ से हटने की बात कही है उनमें नुकसान करने,हानि पहुंचाने व न्यायिक निर्णय को रोकने की क्षमता है।
कोर्ट ने कहा कि-
''हम कहना चाहते है कि किसी मुविक्कल को जज पर 'कथित पूर्वग्रह या पक्षपाती' होने की बात कहकर सवाल उठाने या उस पर संदेह करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है और विशेषतौर पर तब जब मामले की सुनवाई शुरू हो चुकी हो और अलग-अलग तारीख पर आदेश दिए जा चुके हो। सामान्यतौर पर यह जज पर छोड़ दिया जाता है िकवह सभी लोगों के साथ बिना किसी डर,पक्ष व पूर्वाग्रह के न्याय करे क्योंकि एक जज खुद न्याय दिलाने के लिए पद की शपथ से बंधा होता है।''
कोर्ट ने कहा कि सवाल पूछना न्यायिक कार्यो का एक हिस्सा है,जिसे जजों द्वारा पूरा किया जाता है। इस मामले में दायर अर्जी को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि-
''हमने यह भी देखा है कि न्यायिक कार्यो में कभी-कभी अप्रिय और कठिन कार्य शामिल होते है। जिनके तहत उचित निर्णय लेने के लिए सवाल पूछने व उत्तर देने की जरूरत होती है। अगर इस तरह के पूर्वाग्रह के दावों को स्वीकर कर लिया गया तो न्यायाधीश के लिए स्पष्टकीरण और जवाब मांगने असंभव हो जाएगा।''
कोर्ट ने इस मामले में रिकार्ड से याचिकाकर्ता का नाम हटा दिया और लीगल सर्विस अॅथारिटी यानि विधिक सेवा प्राधिकरण को इस केस में बतौर याचिकाकर्ता नियुक्त कर दिया है। वहीं मंदर के पूर्व वकील प्रशांत भूषण को बतौर कोर्ट मित्र नियुक्त कर दिया है। अब इस मामले में नौ मई को सुनवाई होगी।

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