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विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी का पंजीयकरण करवाने से पहले तीस दिन का नोटिस देने के मामले में मुस्लिम महिला पहुंची दिल्ली हाईकोर्ट

Live Law Hindi
9 May 2019 8:45 AM GMT
विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी का पंजीयकरण करवाने से पहले तीस दिन का नोटिस देने के मामले में मुस्लिम महिला पहुंची दिल्ली हाईकोर्ट
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दिल्ली हाईकोर्ट ने सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट को यह निर्देश दिया है कि दो अलग-अलग धर्म से संबंध रखने वाले जोड़े की शादी करवाए। इस मामले में मुस्लिम धर्म से संबंध रखने वाली महिला ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत विवाह का पंजीयकरण करवाने से पहले 30 दिन का नोटिस देने के नियम को चुनौती दी थी। यह समय अवधि इसलिए रखी गई है ताकि इस तरह के विवाह पर अगर किसी को आपत्ति हो तो उसे दर्ज किया जा सके।

महिला ने एनजीओ 'धनक आॅफ हयूमेनिटी' के जरिए कोर्ट में अर्जी दायर की थी। यह एनजीओ अलग-अलग धर्म से संबंध रखने वाले जोड़ों की शादी में आने वाली परेशानियों को दूर करने की दिशा में काम करती है।

दरअसल महिला व एनजीओ ने विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत विवाह के पंजीयकरण के लिए अप्लाई करने की प्रक्रिया को रद्द करने की मांग की थी, जिसमें पब्लिक नोटिस जारी कर 30 दिन तक इस तरह के विवाह पर आपत्ति दर्ज करने का मौका देना भी शामिल है। यह दलील दी गई कि इस तरह के नियमों से उनको भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीने के अधिकार व व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किया जा रहा है।

कोर्ट के समक्ष उन्होंने 30 दिन के नोटिस की अवधि पर जोर देते हुए कहा कि यह अवधि शादी करने के इच्छुक जोड़े के उन परिजनों को एक मौका देती है जो इस तरह के गैर-जाति या गैर धर्म विवाह के खिलाफ होते है। जबकि आज की परिस्थितियों में यह जरूरी हो गया है कि गैर-समुदाय में विवाह करने वाले जोड़ों को पर्याप्त सुरक्षा दी जाए।

उन्होंने यह भी कहा कि यह नियम पक्षपात करने वाले है क्योंकि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत उसी दिन शादी की जा सकती है। वहीं निकाहनामे पर हस्ताक्षर करने से भी तुरंत पति व पत्नी का दर्जा मिल जाता है।

गौरतलब है कि महिला व उसके हिंदू जीवनसाथी ने मार्च में दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के सामने पेश होकर शादी करने की इच्छा जताई थी। पर उनको यह बताया गया कि ऐसा करने से पहले उन्हें 30 दिन का नोटिस देना होगा। उसके बाद ही उनके विवाह का पंजीयकरण हो सकता है। साथ ही उनसे अपने घर के पते का सबूत पेश करने के लिए कहा गया है। यह भी उनके लिए एक परेशानी है क्योंकि महिला उत्तर प्रदेश की है और वह कुछ दिन पहले ही घर से अपनी मर्जी से आई है क्योंकि उसके माता-पिता उसकी शादी किसी अन्य व्यक्ति से करवाना चाहते थे।

अंतिम सुनवाई पर सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट ने जस्टिस एस. रवींद्र भट्ट व जस्टिस प्रतीक जालन की खंडपीठ के समक्ष बताया था कि दोनों पक्ष ही सामान्य तौर पर दिल्ली में नहीं रहते हैं। इसलिए कंप्यूटर साफटवेयर उनके पते को शादी के पंजीयकरण के लिए पहचान नहीं पा रहा है।

कोर्ट ने यह पाया कि महिला दिल्ली के एक शेल्टर होम में बीते 6 फरवरी से रह रही है। इसलिए कोर्ट ने डिफेंस कालोनी के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) को यह निर्देश दिया है कि वह जांच करे और यह देखे कि क्या दूसरी याचिकाककर्ता (महिला) 6 फरवरी 2019 से उस शेल्टर होम में रह रही है या नहीं। अगर ऐसा है तो वह कानून के अनुसार अपनी शादी कर सकती है। वहीं, जहां तक याचिकाकर्ता का 30 दिन के नोटिस अवधि पर आपत्ति का सवाल है तो उन्होंने 11 मार्च 2019 को शादी के लिए अर्जी दी थी।

खंडपीठ ने कहा कि, विशेष विवाह अधिनियम के प्रावधानों में ऐसा कुछ नहीं कहा गया है कि दोनों पक्षों के रिहायशी पते पर नोटिस भेजे जाएंगे। यह सिर्फ एसडीएम द्वारा संबंधित कार्यालय के नोटिस बोर्ड पर नोटिस चिपकाने से संबंधित है।

"मामले में सिर्फ एक अवरोध बचा है वो पब्लिक नोटिस से संबंधित है। इस संबंध में कोर्ट डब्ल्यू.पी(सी)नंबर 748/2009, प्रणव कुमार मिश्रा बनाम दिल्ली सरकार मामले में दिए गए फैसले को फिर से याद कर रही है। यह फैसला 8 अप्रैल 2009 को दिया गया था। इस फैसले में कोर्ट ने माना था कि अधिनियम के प्रावधानों में ऐसा कुछ नहीं है कि दोनों पक्षों के रिहायशी पतों पर नोटिस भेजा जाएगा। सह सिर्फ संबंधित एसडीएम के कार्यालय के नोटिस बोर्ड पर लगाने से संबंधित है।''

ऐसे में इस मामले में किए गए विचार-विमर्श के आधार पर डिफेंस कालोनी का एसडीएम पहले यह जांच करेगा कि दूसरी याचिकाकर्ता महिला 6 फरवरी 2019 से शेल्टर होम में रह रही है या नहीं। अगर ऐसा है तो वह शादी कर सकते है क्योंकि (यह माना जाएगा कि नोटिस 6 फरवरी 2019 को जारी किया गया है और उसकी 30 दिन की अवधि पूरी हो गई है)। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में उचित आदेश 1 सप्ताह के अंदर उपलब्ध करा दिया जाएगा। अब इस मामले में 29 जुलाई को सुनवाई होगी।

इस मामले में महिला एक हिंदू लड़के से प्यार करती है और जब उसके परिजनों ने उसे प्रताड़ित करना शुरू किया तो वह उत्तर प्रदेश स्थित अपने घर से अपनी मर्जी से निकल आई। नवम्बर 2018 में उसके पिता ने उसकी शादी उन्हीं के धर्म के एक अन्य व्यक्ति से तय कर दी थी और जब उसने इसका विरोध किया तो उसे प्रताड़ित किया गया।

फरवरी 2019 में उसकी शादी होने वाली थी परंतु शादी से कुछ दिन पहले वह अपने घर से अपनी मर्जी से निकल गई और एनजीओ 'धनक आॅफ ह्यूमैनिटी' से संपर्क किया। जो उसको शेल्टर होम में ले गए। उसके बाद उसने दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की, जिसके बाद दिल्ली सरकार को यह निर्देश दिया गया कि उसे सुरक्षा दी जाए।

मार्च में महिला व उसके प्रेमी ने एसडीएम कार्यालय से संपर्क किया और जिन्होंने उसे 30 दिन के नोटिस की अवधि के बारे में बताया। अपनी याचिका में एनजीओ ने कहा है कि शादी करने की यह प्रक्रिया भारतीय संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

याचिका में कहा गया कि राज्य को शादी से कोई मतलब नहीं है बल्कि जो प्रक्रिया तय की गई है वह अपने आप में आज के बदलते समय के प्रति सोच को दर्शा रहा है। भारत जैसे धर्म-निरपेक्ष देश में गैर-धर्म या जाति के विवाह को बढ़ावा दिया जाना चाहिए न कि विशेष विवाह अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देकर उसे रोका जाए। इस अधिनियम को इसलिए बनाया गया था ताकि यह उन केस को कवर कर सके जो अन्य किसी कानून के तहत नहीं आते है।

याचिका में यह भी दलील दी गई कि जो प्रक्रिया शादी के लिए तय की गई वह विवाह के इच्छुक जोड़ों को कोई अन्य तरीका अपनाने के लिए मजबूर करती है, जिसमें किसी धार्मिक स्थान पर जाकर शादी करना या धर्म बदलकर शादी करना आदि शामिल है।

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