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गवाहों से पूछताछ के वैध नहीं होने पर क्या मामले के दुबारा सुनवाई का आदेश दिया जा सकता है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट करेगा जाँच

Live Law Hindi
18 March 2019 4:19 PM GMT
गवाहों से पूछताछ के वैध नहीं होने पर क्या मामले के दुबारा सुनवाई का आदेश दिया जा सकता है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट करेगा जाँच
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अगर किसी मामले में गवाहियों के बयान आरोपियों की अनुपस्थिति में दर्ज किए गए हैं तो क्या दुबारा नए सिरे से पूरी सुनवाई का आदेश दिया जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट आत्मा राम बनाम राजस्थान राज्य मामले में इस मुद्दे पर ग़ौर कर रही है। कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दुबारा सुनवाई के बाद फ़ैसला सुनाने पर रोक लगा दिया है। वरिष्ठ वक़ील रंजीत कुमार को पीठ ने अमिकस क्यूरी नियुक्त किया है। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा की पीठ कररही है।

कोर्ट इस मामले पर अगली सुनवाई अब 13 मार्च को करेगी। कोर्ट ने कहा, "हम लोग इस मामले पर विचार कर रहे हैं और इसलिए बेहतर यह है कि अभी इस मामले पर कोई फ़ैसला नहीं दिया जाए। इसलिए हम निचली अदालत को निर्देश देते हैं कि वह अभी इस मामले पर इस कोर्ट के अगले आदेश का इंतज़ार करे।"

हाईकोर्ट ने दुबारा सुनवाई का आदेश दिया

आत्मा राम और चार अन्य लोगों को निचली अदालत ने दोषी क़रार दिया और उन्हें मौत की सज़ा सुनाई। राजस्थान हाईकोर्ट में इन लोगों ने यह दलील दी कि यह पूरी सुनवाई ग़लत है क्योंकि निचली अदालत ने अभियोजन के बहुत सारे गवाहों की गवाही उनकी अनुपस्थिति में दर्ज की। निचली अदालत के ऑर्डर शीट में भीयह कहा गया है कि आरोपियों को जेल से अदालत में नहीं लाया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी की अनुपस्थिति में गवाहियों के बयान दर्ज करने को क़ानूनन सही नहीं कहा जा सकता क्योंकि ये सीआरपीसी की धारा 273 के प्रावधानों के ख़िलाफ़ है।

कोर्ट ने कहा,"आरोपी न्यायिक हिरासत में थे…निचली अदालत ने कई बार जेल अथॉरिटीज़ से कहा कि आरोपियों को अदालत लाया जाना चाहिए पर कोर्ट ख़ुद ही यह सुनिश्चित करने से चूक गया। आरोपी को सीआरपीसी की धारा 273 के तहत यह पूरा अधिकार है कि उनकी उपस्थिति में गवाहियों के बयान दर्ज किए जाएँ और निष्पक्षसुनवाई और स्वाभाविक न्याय इसके आधार हैं। इसलिए निस्सन्देह, आरोपियों की अनुपस्थिति में गवाहियों के बयान को रेकर्ड करने के बारे में, विशेषकर तब जब सभी आरोपी न्यायिक हिरासत में थे, यह नहीं कहा जा सकता कि यह पूरी तरह क़ानूनी तरीक़े से किया गया।"

पर मुद्दा यह था कि क्या पूरी सुनवाई को ही अमान्य क़रार दिया जाए या फिर सीआरपीसी की धारा 391 के तहत गवाहियों के बयान दुबारा दर्ज कराने का आदेश दिया जाए या फिर इस मामले में पहले दिए गए फ़ैसले को रद्द कर दिया जाए और दुबारा सुनवाई का आदेश दिया जाए।

इसके बाद कोर्ट ने दुबारा सुनवाई का आदेश दिया और उन गवाहियों के बयान क़ानूनी रूप से वैध तरीक़े से दर्ज किए जाएँ।



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