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मंदिर में प्रतिदिन होने वाली गतिविधियों में भाग लेना यह निर्धारित करता है कि मंदिर निजी है या सार्वजनिक : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
3 March 2019 1:46 PM GMT
मंदिर में प्रतिदिन होने वाली गतिविधियों में भाग लेना यह निर्धारित करता है कि मंदिर निजी है या सार्वजनिक : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आम लोगों का मंदिर के दर्शन और प्रतिदिन की पूजा या समारोहों में भाग लेना मंदिर के निजी/सार्वजनिक चरित्र के निर्धारण के लिए महत्त्वपूर्ण है।

इस संबंध में इंदौर के एक राम मंदिर के पुजारी ने एक मामला दायर कर यह घोषित किए जाने की माँग की कि मंदिर निजी है और राज्य को इस मंदिर के प्रबंधन, पूजा अर्चना और कृषि भूमि पर क़ब्ज़े का कोई अधिकार नहीं है। मामले में राज्य सरकार के अधिकारियों के ख़िलाफ़ हुक्मनामा भी जारी करने का आग्रह किया गया। यद्यपि मिचलि अदालत ने इस मामले में अपना फ़ैसला सुना दिया था पर प्रथम अपीली अदालत ने इसे निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने भी प्रथम अपीली अदालत के फ़ैसले को सही ठहराया और कहा कि विवादित भूमि भगवान के नाम पर है और राम दास और बजरंग दास के नाम पुजारी के रूप में हैं और पुजारियों के नाम बदलते रहे हैं और ये पुजारी किसी एक परिवार के नहीं हैं और इनके बीच कोई ख़ून का रिश्ता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि उन्होंने इस बाबत कोई सबूत नहीं दिया है कि इस मंदिर को किसने बनवाया और उसने इसके लिए पैसे कहाँ से जमा किए। कोर्ट ने यह भी कहा कि रजिस्टर में श्री राम मंदिर का सार्वजनिक मंदिर के रूप में दर्ज करना इस बात का पुख़्ता सबूत है कि श्री राम मंदिर एक सार्वजनिक मंदिर है। तिलकायत श्री गोविंदलालजी महाराज इत्यादि बनाम राजस्थान राज्य मामले में आए फ़ैसले का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति आर बनुमती और न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी की पीठ ने कहा,

"मंदिर में दर्शन के लिए आम लोगों का आना और इस मंदिर में प्रतिदिन होने वाली पूजा और अन्य समारोहों में भाग लेना इस मंदिर के चरित्र को निर्धारित करने के लिए काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। वर्तमान मामले में, अपीलकर्ता ने इस तरह का सबूत पेश नहीं किया है मंदिर में दर्शन के लिए सीमित रूप से भाग लेने की ही आज़ादी है।

कोर्ट ने हाईकोर्ट के विचार से भी सहमति जताई कि जब पुजारी का पद वंशानुगत नहीं है, तो मंदिर को निजी मंदिर नहीं कहा जा सकता। पीठ ने कहा, "अगर मंदिर निजी मंदिर होता, तो पुजारी वंशानुगत होता और यह हिंदू उत्तराधिकार के सिद्धांत पर चलता। यानी, ख़ून के रिश्ते, शादी और गोद लेने की व्यवस्था से चलता। अभी के मामले में उत्तराधिकार गुरु-शिष्य संबंधों पर चल रहा है। पहले के पुजारी का बाद में होने वाले पुजारी से ख़ून का कोई रिश्ता नहीं है।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि वादियों को सरकार ने इस मंदिर का पुजारी नियुक्त किया और इसलिए उनपर इस मंदिर को निजी मंदिर कहने से रोक लगाया जा रहा है। पीठ ने यह भी कहा कि वादियों का यह कहना कि मंदिर की परिसंपत्ति को सरकार से लीज़ पर लिया गया है उनके ख़िलाफ़ गया है।


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