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एमएसीटी मामले में 'सर्वाधिक बेहतर' गवाह से पूछताछ नहीं करना अनर्थकारी नहीं है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
18 Feb 2019 4:09 PM GMT
एमएसीटी मामले में सर्वाधिक बेहतर गवाह से पूछताछ नहीं करना अनर्थकारी नहीं है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मोटर वाहन दुर्घटना दावे के मामले में अगर सर्वाधिक बेहतर गवाह से पूछताछ नहीं की गई तो यह अनर्थकारी नहीं हैं।

न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा कि अगर किसी दुर्घटना में परिवार के किसी व्यक्ति की मौत हुई है तो अधिनियम के तहत मुआवज़े के निर्धारण के दौरान अति तकनीकी और मामूली अप्रोच से बचना चाहिए।

Sunita vs. Rajasthan State Transport Corporation मामले में हाईकोर्ट ने अधिकरण के फ़ैसले को मुख्य रूप से इसलिए ख़ारिज कर दिया था क्योंकि इस मामले में सर्वाधि बेहतर गवाह वो आदमी था जो पीछे बैठा था और उससे कोई पूछताछ नहीं की गई। कोर्ट ने कहा कि ऐसा कहकर हाईकोर्ट ने ग़लती की है कि अधिकरण ने उन अन्य गवाहियों की गवाही पर भरोसा कर ग़लती की है जो यह तक नहीं कह पाए कि उस व्यक्ति की उम्र क्या थी जो गाड़ी चला रहा था।

दावेदार द्वारा दायर अपील पर ग़ौर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा की ड्राइवर के पीछे बैठे व्यक्ति से पूछताछ नहीं होने से कोई अनर्थ नहीं हो गया है। कोर्ट ने कहा,

"दुर्घटना दावे में साक्ष्यों की जाँच का मतलब यह नहीं है कि जिन बेहतर प्रत्यक्षदर्शियों से पूछताछ नहीं हुई है उसको लेकर इसमें दोष ढूँढा जाए बल्कि उपलब्ध साक्ष्य का विश्लेषण कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो मामला सामने लाया गया है उससे संबंधित प्रश्नों का पर्याप्त जवाब मिलता है कि नहीं…"

जहाँ तक अन्य गवाहों की बात है, अगर कोई गवाह यह नहीं बता पाया कि पीछे बेठे व्यक्ति की उम्र क्या थी तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसने जो बाक़ी बातें कही हैं उसको भी नकार दिया जाए विशेषकर उस स्थिति में जबकि इस गवाह की दुर्घटनास्थल और दुर्घटना के समय उपस्थिति निर्विवाद है और ठोकर मारने वाले वाहन के चालक के बारे में उसकी गवाही भी…"

हाईकोर्ट ने इस आपराधिक मामले में गवाही देने वाले प्रत्यक्षदर्शियों की सूची में शामिल एक गवाह के नाम पर भी आपत्ति की। इस बारे में कोर्ट ने कहा,

"वाहन दुर्घटना दावा जैसे आपराधिक मामले में ऐसे गवाह जो गवाहों की सूची में शामिल नहीं हैं, ऐसे गवाह की गवाही से संबंधित बयान को बाहर किए जाने जैसा अधिनियम में कुछ भी नहीं है। महत्त्वपूर्ण यह है कि दूसरे पक्ष को संबंधित गवाही से पूछताछ का उचित मौक़ा मिलना चाहिए। एक बार जब यह हो जाता है, तो फिर वे अपने ख़िलाफ़ किसी भी तरह के भेदभाव की शिकायत नहीं कर सकते। अगर गवाही के बारे में किसी तरह का संदेह था तो इसे गवाही से होने वाली पूछताछ के समय उठाया जाना चाहिए था और अधिकरण ने प्रतिवादी को इसका मौक़ा दिया था।"

इस तरह कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को ख़ारिज कर दिया और अधिकरण ने जो आदेश दिया था उसे बहाल कर दिया।


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