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आधार में दी गई सूचना को आपराधिक मामलों के लिए निर्णयात्मक सबूत नहीं माना जा सकता : इलाहाबाद हाईकोर्ट [निर्णय पढ़े]

Rashid MA
30 Jan 2019 5:00 AM GMT
आधार में दी गई सूचना को आपराधिक मामलों के लिए निर्णयात्मक सबूत नहीं माना जा सकता : इलाहाबाद हाईकोर्ट [निर्णय पढ़े]
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि आधार कार्ड में जो सूचनाएँ संग्रहीत हैं जैसे के जन्म तिथि आदि को उसे किसी आपराधिक मामलों के लिए निर्णयात्मक सबूत नहीं माना जा सकता।

यह ध्यान देने वाली बात है कि इससे पहले पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट इसके उलट फ़ैसला दे चुका है।

न्यायमूर्ति अजय लांबा और न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की पीठ ने एक दम्पति की याचिका पर यह बात कही। इस दम्पति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एक लड़की की माँ द्वारा एक लड़के और उसके परिवार के ख़िलाफ़ दायर आपराधिक मामले को ख़ारिज करने की माँग की। कोर्ट के समक्ष उन्होंने आधार कार्ड पेश करके यह साबित करने की कोशिश की थी कि लड़का और लड़की दोनों ही वयस्क हैं और शादी की उम्र में पहुँच चुके हैं।

कोर्ट ने इस बारे में UIDAI से इस बारे में जवाब माँगा था। आधार कार्ड में लड़के की उम्र 01.01.1997 और लड़की की उम्र 01.01.1999 बताया गया था। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में आयु महत्त्वपूर्ण हो गया है कोंकि याचिकाकर्ताओं ने आधार कार्ड में दिए जन्म तिथि पर भरोसा किया है और यह बताया है कि दोनों वयस्क हैं और शादी की उम्र में पहुँच चुके हैं।

कोर्ट ने UIDAI से पूछा था कि क्या आधार कार्ड को जन्म तिथि/उम्र का साक्ष्य माना जा सकता है या नहीं।

UIDAI ने अपने हलफ़नामे में कहा कि अगर किसी व्यक्ति के पास जन्म तिथि को प्रमाणित करने के लिए कोई और वैध दस्तावेज़ नहीं है तो उसका जन्म तिथि घोषित जन्म तिथि के या अनुमान के आधार पर दर्ज किया जाता है। अनुमानित जन्म तिथि के संदर्भ में सम्बंधित व्यक्ति अपना उम्र ऑपरेटर को बताता है और ECMP क्लाइंट उसके जन्म के वर्ष का अनुमान लगाता है। इसके बाद जन्म तिथि बाई डिफ़ॉल्ट रेकर्ड किया जाता है और इस तरह उस कैलेंडर साल में एक जनवरी को उसका जन्म तिथि रेकर्ड किया जाता है। हलफ़नामे में यह भी कहा गया है कि आधार अधिनियम ने यह कहीं नहीं कहा गया है कि आधार कार्ड को जन्म तिथि का सबूत माना जाएगा।

दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद कोर्ट ने कहा, "…आधार कार्ड के आधार पर, साक्ष्य अधिनियम के तहत यह नहीं कहा जा सकता कि उसमें दी गई जानकारियाँ इन तथ्यों के निर्णयात्मक सबूत हैं। अगर इनके बारे में सवाल उठता है, तो किसी आपराधिक मामले की जाँच के संदर्भ में जन्म तिथि और अन्य जानकारियों का सत्यापन किए जाने की ज़रूरत है।"

इस मामले में लड़की की उम्र का पता Ossification Test से लगाया गया था और इस आधार पर जाँच एजेंसी ने कहा था कि लड़की बालिग़ है। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को सही माना क्योंकि Ossification test वैज्ञानिक चिकित्सकीय जाँच पर आधारित है।

पीठ ने अंततः इस लड़के और उसके परिवार के ख़िलाफ़ दायर एफआईआर को ख़ारिज कर दिया और कहा कि लड़की को अगवा नहीं किया गया है।

दिल्ली हाईकोर्ट

गत वर्ष दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि आधार कार्ड को जेजे नियमों के तहत नियम 7 उद्देश्य के लिए उम्र के सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इस बारे में इस कोर्ट ने इस बारे में मद्रास हाईकोर्ट से अलग मत दिया था। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा था कि आधार कार्ड जन्म तिथि का प्रमाण नहीं हो सकता।


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