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फर्जी जनहित याचिकाओं के खिलाफ कार्रवाई-बाॅम्बे हाईकोर्ट ने 'क्रमिक या सिलसिलेवार याचिकाकर्ता' को किया आदिवासी क्षेत्र में छात्रों से आंकड़े एकत्रित करने के लिए अर्ध कानूनी स्वयंसेवक नियुक्त [आर्डर पढ़े]

Live Law Hindi
28 July 2019 6:29 AM GMT
फर्जी जनहित याचिकाओं के खिलाफ कार्रवाई-बाॅम्बे हाईकोर्ट ने क्रमिक या सिलसिलेवार याचिकाकर्ता को  किया आदिवासी क्षेत्र में छात्रों से आंकड़े एकत्रित करने के लिए अर्ध कानूनी स्वयंसेवक नियुक्त [आर्डर पढ़े]
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बाॅम्बे हाईकोर्ट ने एक सपन श्रीवास्तव के द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद एक अद्भुत आदेश दिया है। गौरतलब है कि सपन हाईकोर्ट के समक्ष 40 से ज्यादा जनहित याचिकाएं दायर कर चुके हैं।

मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नंदराजोग और जस्टिस एन. एम. नामदार की पीठ ने यह कहा कि-
''हमने पाया है कि जनहित याचिकाएं दायर करने के अलावा याचिकाकर्ता बतौर अर्ध कानूनी स्वयंसेवक के तौर पर सेवाएं देकर समाज की सहायता नहीं कर रहा है। कोर्ट का मानना है कि किसी भी जनहित याचिका को दायर करने से पहले या जो पहले दायर हो चुकी हैं, याचिकाकर्ता को अर्ध कानूनी स्वयंसेवक के तौर पर सेवाएं देनी चाहिए।''

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह निर्देश दिया है कि वह जिला विधिक सेवा कमेटी, जिला थाने के अध्यक्ष के समक्ष पेश हों, जो याचिकाकर्ता को अर्ध कानूनी स्वयंसेवक यानि पैरा लीगल वालंटियर का काम सौंप देंगे।

कोर्ट ने कहा कि-
याचिकाकर्ता को थाने जिले के आदिवासी इलाके में बतौर अर्ध कानूनी स्वयंसेवक नियुक्त किया जाए और हम याचिकाकर्ता को यह निर्देश देते हैं कि वह निम्नलिखित तथ्यों पर इस आदिवासी इलाके से सूचनाएं एकत्रित करके लाए, जो इस प्रकार है-

1- कितने आदिवासी स्कूलों में हाॅस्टल मौजूद हैं।
2- आदिवासी इलाके में कार्यरत स्कूलों में कितने शिक्षक काम करते है।
3- स्कूलों में कितने आदिवासी बच्चों के दाखिले हुए हैं।
4- क्या आदिवासी छात्रों का नियमित तौर पर मेडिकल चेकअप होता है?
5- याचिकाकर्ता व्यक्तिगत तौर पर कम से कम 100 छात्रों से खुद मिले और उनसे पूछे कि क्या उनको दी जा रही शिक्षा से वे संतुष्ट हैं?

श्रीवास्तव को लेकर अदालत पहले भी कर चुका है टिप्पणी
दरअसल श्रीवास्तव वही मुविक्कल हैं, जिनके खिलाफ हाईकोर्ट ने पहले भी एक याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की थी। गौरतलब है कि उन्होंने शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत अपने बेटे का स्कूल में दाखिला दिलवाए जाने की मांग की थी। उन्होंने कहा था कि उनके बेटे का दाखिला उस 25 प्रतिशत कोटे के तहत करवाया जाए, जो उन माता-पिता के बच्चों के लिए आरक्षित है, जिनकी वार्षिक आय 1 लाख रुपए से कम है। श्रीवास्तव ने यह दावा किया था कि वो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से संबंध रखते हैं।

पीठ ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि-
''ऐसा नहीं हो सकता है कि याचिकाकर्ता के पास सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी प्राप्त करने और 25 जनहित याचिकाओं को दायर करने के लिए धन का भुगतान करने के साधन हैं और वो दूसरी तरफ समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से होने का दावा करता है। यह भी देखा गया है कि याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई सभी जनहित याचिकाओं के दौरान, कोर्ट के नियमों के तहत उन्होंने शपथ लेते हुए यह बताया था कि सभी जनहित याचिकाओं को दायर करने और केस लड़ने का खर्च उन्होंने खुद वहन किया है। जो उन्होंने अपने आय स्रोत से दिया है।''

गौरतलब है कि कोर्ट ने इस जनहित याचिका पर 14 सप्ताह बाद आदेश पास किया है।


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