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कोर्ट को पितृत्व की स्थापना के लिए डीएनए टेस्ट कराने का आदेश पारित करने से पहले परिस्थितियों के प्रति सावधान व संदेवनशील रहना चाहिए-राजस्थान हाईकोर्ट [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
29 May 2019 8:35 AM GMT
कोर्ट को पितृत्व की स्थापना के लिए डीएनए टेस्ट कराने का आदेश पारित करने से पहले परिस्थितियों के प्रति सावधान व संदेवनशील रहना चाहिए-राजस्थान हाईकोर्ट [निर्णय पढ़े]
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राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि उन मामलों में अदालतों को परिस्थितियों के प्रति बहुत ज्यादा सावधान व संवेदनशील रहना चाहिए,जिनमें पितृत्व को स्थापित करने के लिए डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया जाता है। कोर्ट ने कहा है िकइस तरह के मामलों में अदालतों को ऐसी मांग स्वीकार करने से पहले सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए और सभी एंगज से मामले को देखना चाहिए क्योंकि इस तरह की मांग किसी व्यक्ति के जीवन को प्रभावित कर सकती है,इस बात को नकारा नहीं जा सकता है।

हालांकि इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए विभिन्न फैसलों पर विश्वास करते हुए पीठ ने इस बात पर सहमति जताई कि डीएनए टेस्ट कराने की अर्जी को केवल साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत निकाले जाने वाले अनुमान के आधार पर नकारा या बाहर नहीं जा सकता है। कोर्ट ने पाया कि सिविल जज ने इस मामले में डीएनए टेस्ट की अर्जी को खारिज करने के लिए जो कारण बताए है वो गलत है या अनुचित है।
क्या था मामला
जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी,जिसमें याचिकाकर्ता पति ने एक सिविल जज के आदेश को चुनौती दी थी। जिसमें याचिकाकर्ता पति ने अपनी पत्नी से पैदा हुए बेटे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की थी। उसका कहना था कि उसने 13 सितम्बर 2017 को अंबत्तूर,चेन्नई के एक अस्पताल में अपनी पत्नी की सोनोग्राफी कराई थी,जिसके अनुसार उसकी पत्नी 35 सप्ताह और छह दिन की गर्भवती थी। जबकि उसकी शादी पांच फरवरी 2017 को हुई थी। ऐसे में जब उसने आकंलन किया तो पाया कि उसकी पत्नी शादी से पहले ही गर्भवती थी। उसने कोर्ट के समक्ष दलील दी थी कि उसकी पत्नी शादी से पहले ही गर्भवती थी,ऐसे में यह बच्चा उसका नहीं है।
प्रतिवादी पत्नी ने दूसरी तरफ ने अर्जी में लगाए गए सभी आरोपों को नकारा और इस बात को माना कि उनकी शादी पांच फरवरी 2017 को हुई थी। उसने कहा कि याचिकाकर्ता उसे शारीरिक व मानसिक तौर पर परेशान करता है और अर्जी में लगाए गए आरोप झूठे है।
उसने यह भी दलील दी कि उसका गर्भवती होना और बेटा पैदा होना,उनकी शादी व उसके पति के साथ बनाए गए संबंधों की वजह से ही है। उसने कहा कि उसे अस्पताल से कोई रिपोर्ट नहीं ली गई,जहां उसका इलाज चल रहा था और अंबत्तूर,चेन्नई के अस्पताल से ली गई रिपोर्ट झूठी है। उसने यह भी कहा कि अगर याचिकाकर्ता चाहता है तो वह डीएनए करा सकता है,उसे कोई आपत्ति नहीं है।
निचली अदालत ने डीएनए टेस्ट कराने की मांग वाली अर्जी को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि प्रेगेंसी आने की अवधि के दौरान याचिकाकर्ता व प्रतिवादी पति-पत्नी के तौर पर रहते थे और उनकी शादी अभी भी बनी हुई है। इसलिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत उसकी पत्नी से पैदा हुए बच्चे को उसी का बेटा माना जाएगा। ऐसे में बच्चे का डीएनए कराने का कोई कारण नहीं बनता है।
डीएनए टेस्ट के लिए निर्देश,अगर टेस्ट की 'प्रख्यात या विशिष्ट आवश्यकता' संतुष्ट हो
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए विभिन्न फैसलों पर विश्वास किया। जो इस प्रकार है- गौतम कुंडू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1993) ३ SCC,शारदा बनाम धर्मपाल (२००३ )४ SCC,रामकन्या बाई बनाम भारत राम (2010) १ SCC,इनके अलावा नारायण दत्त तिवारी बनाम रोहित शेखर व अन्य २०१२ (12) एससीसी। इन मामलों में शीर्ष कोर्ट ने इस विषय पर विस्तार से विचार किया है।
अन्य टिप्पणियों के अलावा इन मामलों में शीर्ष कोर्ट ने कहा था कि डीएनए टेस्ट के लिए निर्देश तभी दिया जा सकता है,जब टेस्ट की ''प्रख्यात या विशिष्ट आवश्यकता' संतुष्ट होती हो।
कोर्ट ने 'निजता के अधिकार' और 'सच्चाई का पता लगाने' के बीच स्पष्ट विरोधाभास के मामले में भी टिप्पणी की थी-
''हमारा मानना है कि जब किसी व्यक्ति की निजता,जिसमें उस पर मेडिकल टेस्ट कराने के लिए दबाव नहीं ड़ाला जा सकता है और सच्चाई जानने के लिए कोर्ट की ड्यूटी,के बीच विरोध हो तो कोर्ट को अपने अधिकार का प्रयोग दोनों पक्षों के हित के बीच संतुलन बनाने और इस बात पर विचार करने के बाद ही करना चाहिए कि क्या डीएनए टेस्ट करवाना बहुत जरूरी है। एक बच्चे के पितृत्व की स्थापना करने के मामले में कोर्ट को डीएनए टेस्ट का निर्देश सामान्य तौर पर नहीं देना चाहिए। कोर्ट को सभी विपरीत परिणामों पर विचार करने के साथ-साथ साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत निकाले जाने वाले अनुमान पर भी विचार करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्या टेस्ट की 'प्रख्यात या विशिष्ट आवश्यकता' संतुष्ट हो रही है और क्या इस टेस्ट के बिना कोर्ट सच्चाई तक नहीं पहुंच सकती है।''
इसमें बच्चे की वैधता की सुरक्षा के लिए एक संरक्षित दृष्टिकोण भी था।

''जब किसी मामले में कोर्ट के समक्ष बच्चे की पितृत्व को स्थापना करने का मामला आता है तो ऐसे में मामले डीएनए का प्रयोग अति नाजुक व संवेदनशील पहलू है। एक विचार ये है कि जब आधुनिक विज्ञान किसी बच्चे की पितृत्व को स्थापित करने के तरीके हमें प्रदान कर रहा है तो जब भी जरूरत हो उनको प्रयोग करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। दूसरा विचार यह है कि कोर्ट को इन साधनों का प्रयोग करने में अनिच्छुक होना चाहिए क्योंकि इनसे किसी व्यक्ति की निजता का हनन होता है। इस तरह के टेस्ट न सिर्फ दोनों पक्षकारों के लिए हानिकारक हो सकते है बल्कि बच्चे भी खराब प्रभाव पड़ सकता है। कई बार इन वैज्ञानिक टेस्ट के परिणाम एक मासूम बच्चे को अवैध बता सकते है,जबकि उसकी मां व उसका जीवनसाथी गर्भाधान के समय साथ रहते थे।''
कोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नंदलाल वासुदेव बादविक बनाम लता नंदलाल बादविक एंड अन्य एआईआर 2014 एससी में दिए गए फैसले पर भी विश्वास किया। इस मामले में माना गया था कि '' जब कानून के तहत परिकल्पित एक निर्णायक सबूत और विश्व समुदाय द्वारा स्वीकार किए गए वैज्ञानिक उन्नति पर आधारित सबूत,के बीच संघर्ष होता है तो उत्तरार्द्ध पूर्व पर हावी होना चाहिए।''
इस स्टेज पर नहीं दी जा सकती है डीएनए टेस्ट की अनुमति

हालांकि अदालत ने विचार किया कि एक मामले में सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद और समय-समय पर शीर्ष न्यायालय द्वारा निर्धारित आवश्यक निर्देशों के अनुपालन के बाद डीएनए परीक्षण को सच्चाई तक पहुंचने के लिए अनुमति दी जा सकती है और इसके लिए आवेदन को अस्वीकार करने में सिविल जज को तर्क को भी गलत पाया गया। हालांकि यह कहा गया है िकइस स्तर पर डीएनए परीक्षण की अनुमति नहीं दे सकते है जब याचिकाकर्ता ने चेन्नई के अंबत्तूर के एक निश्चित अस्पताल से संबंधित रिपोर्ट प्रस्तुत करने के संबंध में अपने दावे को सही साबित नहीं किया है,जहां उसने कथित तौर पर अपनी पत्नी की सोनोग्राफी कराई थी। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी सत्यता को साबित नहीं किया है। दूसरी तरफ उसकी पत्नी इस तरह का कोई टेस्ट कराए जाने से इंकार कर रही है। बच्चे की गर्भावस्था की अवधि के संबंध में एक्सपर्ट के बयान होने बाकी है।
''इस स्टेज पर डीएनए टेस्ट की अनुमति देना उचित नहीं होगा,वह भी पति के बिना किसी सबूत के दिए गए बयान के आधार पर। पति के पास अपने दावे के संबंध में रिकाॅर्ड पर कोई कानूनी सबूत नहीं है,जैसा की शीर्ष कोर्ट ने सभी उपरोक्त निर्णयों में उल्लेख किया है। कोर्ट खून के टेस्ट की अनुमति सामान्य दिनचर्या के काम के तौर पर नहीं दे सकती है। पति को संदेह से परे पूरी अवधि के दौरान पत्नी के प्रति गैर-ज्यादती को साबित करना होगा। कोर्ट को डीएनए टेस्ट की अनुमति देने से पहले परिस्थितियों के प्रति बहुत सावधान व संवेदनशील रहना होगा।''
इस मुद्दे पर विचार करने या संबोधित करने के लिए नहीं है भारत में कोई अधिनियम

कोर्ट ने कहा कि यूके में 2006 ह्यूमन टिश्यू एक्ट यानि 2006 का मानव ऊतक अधिनियम लागू किया गया था,जिसके तहत कहा गया था कि बिना अनुमति के किसी मानव के टिश्यू को लेना,एकत्रित करना या उनका प्रयोग करना अवैध है। दुर्भाग्यवश भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है,सिवाय कुछ फैसलों के। हालांकि इन फैसलों में भी बच्चों के अधिकार के बारे में कुछ नहीं कहा गया है,जबकि माता-पिता सामान्यतौर पर बच्चे का डीएनए करवा देते है,जो समाज में उसके अस्तित्व को ही अवैध बना सकता है।
इसलिए कहा गया है कि कानून निर्माताओं को उक्त पहलू पर विचार करने की आवश्यकता है,लेकिन जब तक ऐसा नहीं किया जाता है,तब तक यह माना जाए कि अदालत की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी अभिभावक या माता-पिता को नाबालिग का डीएनए कराने के लिए अधिकृत नहीं किया जाएगा।
इस तरह की अर्जी को स्वीकार करने से पहले अदालत को कुछ कदमों पर विचार करना चाहिए।
-क्या इस तरह के डीएनए टेस्ट के लिए 'प्रख्यात या विशिष्ट आवश्यकता'है
-क्या इस तरह के टेस्ट से नाबालिग के अस्तित्व पर किसी भी प्रकार से बुरा प्रभाव पड़ेगा?
-इस तरह की रिपोर्ट को सार्वजनिक न किया जाए।
याचिकाकर्ता की तरफ से वकील रजनीश गुप्ता पेश हुए थे।

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