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पत्नी से की जाती है पति के परिवार के साथ रहने की उम्मीद,बिना ''न्यायोचित कारण'' के नहीं किया जा सकता है सास से अलग रहने को मजबूर-उत्तराखंड हाईकोर्ट [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
28 May 2019 2:57 PM GMT
पत्नी से की जाती है पति के परिवार के साथ रहने की उम्मीद,बिना न्यायोचित कारण के नहीं किया जा सकता है सास से अलग रहने को मजबूर-उत्तराखंड हाईकोर्ट [निर्णय पढ़े]
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’’आमतौर पर कोई पति इसे बर्दाश्त नहीं करेगा,न ही कोई बेटा अपनी उस बूढ़ी मां से अलग होना चाहेगा,जो अपने बेटे पर निर्भर हो।’’

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि बार-बार एक पत्नी द्वारा अपने पति पर इस बात के लिए दबाव बनाना कि वह अपनी मां से अलग हो जाए,क्रृरता का बर्ताव या आचरण है।

दो सदस्यीय खंडपीठ के जस्टिस सुधांशु धुलिया और जस्टिस आर.सी खुलबे ने पति की तरफ से दायर उस अपील को स्वीकार कर लिया,जिसने पत्नी पर क्रूरता करने का आरोप लगाते हुए तलाक मांगा था।
पीठ ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2016 में नरेंद्रा बनाम के.मीना के मामले में दिए गए फैसले से कुछ उद्धरण चिन्ह का हवाला दिया।
''आम परिस्थितियों में एक पत्नी से अपेक्षा की जाती है कि वह शादी के बाद अपने पति के परिवार के साथ रहे क्योंकि वह शादी के बाद पति के परिवार का एक अहम हिस्सा बन जाती है। ऐसे में बिना किस अनुचित या न्यायोचित कारण के वह अपने पति पर इस बात के लिए दबाव नहीं बना सकती है कि वह अपनी बूढ़ी मां से अलग होकर उसके साथ किसी किराए के अलग घर में रहे। हमारा मानना है कि सामान्यतौर पर कोई पति इसे बर्दाश्त नहीं करेगा,न ही कोई बेटा अपनी उस मां से अलग होना चाहेगा,जो अपने बेटे पर निर्भर हो। प्रतिवादी या पत्नी द्वारा बार-बार याचिकाकर्ता पर इस बात के लिए दबाव बनाना िकवह अपनी मां से अलग हो जाए,यह पति को प्रताड़ित करने के समान है। हमारे विचार में यह प्रतिवादी का यह आचरण क्रूरता करने के समान है।''
न्यायाधीशों ने कहा कि इस मामले में कोई ऐसा ''न्यायोचित कारण'' उनको नहीं मिला,जिसके आधार पर प्रतिवादी पत्नी अपनी सास से अलग होना चाहती थी। फैसले में यह भी कहा गया कि-
''किसी बेटे के लिए यह कोई सामान्य परंपरा,वांछनीय और स्वीकार्य मानदंड नहीं है कि
वह पत्नी के साथ घर बसाने के लिए अपनी बूढ़ी मां को छोड़कर चला जाए,वो भी तब जब उसकी देखभाल करने वाला कोई न हो। विशेषतौर पर जब वह घर में कमाने वाला अकेला हो। जब मां ने अपने बेटे को पाला-पोसा और उसे पढ़ाया है तो बेटे की भी नैतिक व कानूनी जिम्मेदारी बनती है
कि
वह अपनी मां की देखभाल करे और जब वह बूढ़ी हो जाए और उसके पास आय को कोई स्रोत न हो तो उसका सहारा बने।
निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए पीठ ने कहा कि निचली अदालत ने उस आचरण पर ध्यान नहीं दिया,जिसमें पत्नी ने बार-बार अपने पति पर उसकी मां से अलग होने का दबाव ड़ाला और सिर्फ पत्नी के साथ अकेले रहने के लिए कहा।
कोर्ट ने इस मामले में पत्नी द्वारा की गई क्रूरता को इंगित किया,जो इस प्रकार है-
-पत्नी द्वारा पति का अपमान करना और उस पर अपमानजनक टिप्पणी करना क्रूरता माना जाएगा।

-पत्नी ने अपने पति से कहा कि
वह आत्महत्या कर लेगी और अपने बेटे को मार देगी और उसे झूठे केस में फंसा देगी,ऐसा कहकर उसने अपने पति पर दबाव बनाया।जो कि क्रूरता के समान है।

-रिश्तेदारों के सामने पत्नी का आचरण और अपनी सास को गाली देना व पति पर व्यंग्यपूर्ण टिप्पणी करना,क्रूरता के समान है।

-अगर पत्नी शारीरिक तौर पर अपनी सास पर हमला करती है और उसे अपशब्द कहती है तो यह भी क्रूरता है।

-पत्नी चाहती है कि पति अपनी मां को छोड़कर और उससे अलग हो जाए ताकि पत्नी अपनी आजादी से रह सके। ऐसे में पति के यह अधिक प्रताड़ित करने वाला होगा कि
वह ऐसी प्रतिवादी पत्नी के साथ रहे और उसके ऐसे आचरण या व्यवहार को बर्दाश्त करे।


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