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वकील नहीं है अपने ग्राहक या मुविक्कल का मुखपत्र,न्यायालय में प्रस्तुतीकरण करते समय रहे जिम्मेदार -सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
12 May 2019 3:48 PM GMT
वकील नहीं है अपने ग्राहक या मुविक्कल का मुखपत्र,न्यायालय में प्रस्तुतीकरण करते समय रहे जिम्मेदार -सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
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सभी को कोर्ट के समक्ष कुछ भी प्रस्तुतीकरण देते समय जिम्मेदारी और सतर्कता से काम लेना चाहिए- यह टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि अगर एक वकील सिर्फ अपने मुवक्किल के मुखपत्र के रूप में काम करे तो वह अपनी ही प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचता है.

यह टिप्पणी जस्टिस अरूण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक लेक्चरार की तरफ से दायर अपील को स्वीकार करते हुए की। याचिकाकर्ता एक निजी, गैर सहायता प्राप्त कालेज,जो की चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी से मान्यता प्राप्त है, में कार्यरत है ।

हाईकोर्ट ने इस मामले में लेक्चरार की रिट पैटिशन को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट के आदेश का बचाव करते हुए विश्वविद्यालय के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक ऐसे फैसले का हवाला दिया जो वर्तमान केस के तथ्यों पर लागू ही नहीं होता था. कोर्ट ने वकील द्वारा पेश किये गए उस पुराने फैसले के बारे में पाया कि वह एक ऐसे एक्ट/अधिनियम पर आधारित था जो अब साफ़ तौर पर रिपील किया जा चूका है, वह एक्ट अब एक कानून की तरह अस्तित्व में ही नहीं है.

कोर्ट ने इस सम्बन्ध में कहा कि -

" आज जबकि सूचनाएँ सरलता से उपलब्ध है और पहले की बजाय जब कई डाइजेस्ट और किताबें पढ़नी होती थी, आज लीगल रिसर्च करना आसान हो गया है, इसके बावजूद एक ऐसे फैसले को पेश किया गया जो एक रिपील हो चुके अधिनियम पर आधारित है. एक ऐसा अधिनियम जो वर्तमान के नए अधिनियम द्वारा स्पष्ट रूप से ख़ारिज किया जा चूका है, उस पर आधारित एक फैसले को साईट करना एक ओवेरुलड फैसले को पेश करने जैसा है. इससे न केवल कोर्ट का समय नष्ट हुआ बल्कि कोर्ट पर ये एक अतिरिक्त जिम्मेदारी डाल दी गयी कि इतनी बेसिक रिसर्च भी वे करें. यह एक लापरवाही हो सकती है परंतु यह कहना भी गलत नहीं होगा कि एक गलत निर्णय का हवाला देकर कोर्ट को गुमराह करने के परिणाम खतरनाक हो सकते थे।''

कोर्ट ने कहा कि मुवक्किल व उनके वकीलों का यह कर्तव्य है कि वे कोर्ट के समक्ष कुछ भी प्रस्तुत करने से उसकी दोहरी जांच व सत्यापन कर ले।

"यह देखते हुए कि वक़्त के साथ,इस तरह की जिम्मेदारी और देखभाल में गिरावट आई है, जबकि न्याय समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अब समय आ गया है इस समस्या पर ध्यान दिया जाए और समस्या को दूर करने के लिए उचित कदमों पर विचार किया जाए। हम एक बार फिर यह दोहराते है कि सभी स्तरों पर मुवक्किल व उनके वकीलों का यह कर्तव्य बनता है कि कोर्ट में कोई भी प्रस्तुति देने से पहले उसकी दोहरी जांच व सत्यापन कर ले। यह संदेश भेजा जाना चाहिए कि अदालत में पेश होने के लिए सभी को जिम्मेदार व सावधान रहना चाहिए। इन सभी मुद्दों पर विचार करने का समय आ गया है ताकि न्याय प्रणाली में नागरिकों का विश्वास न खोए। सभी स्तरों पर न्यायालयों को भी इस बात पर विचार करना होगा कि किसी पक्षकार की कोई प्रस्तुति या किसी पक्षकार का आचरण कोर्ट के समय की अनावश्यक बर्बादी न करे और अगर ऐसा होता है तो उस संबंध में कोर्ट उचित आदेश पारित करे। निश्चित तौर पर कोर्ट का समय न्याय वितरण के लिए प्रयोग होना चाहिए। एडवरसेरिअल सिस्टम, जहाँ फैसला दोनों वकीलों के बीच जिरह द्वारा किया जाता है, इस बात का लाइसेंस नहीं है कि कोर्ट के वक़्त के बर्बादी की जाये।''

एक वकील के कर्तव्यों की याद दिलाते हुए जस्टिस अरूण मिश्रा व जस्टिस नवीन सिन्हा की पीठ ने कहा कि-

"अदालत के एक जिम्मेदार अधिकारी और न्याय के प्रशासन के एक महत्वपूर्ण सहायक के रूप में, वकील न्यायालय और अपने मुवक्किल दोनों के ही प्रति जिम्मेदार होता है. उसे निष्पक्षता के साथ काम करना चाहिए ताकि न्याय सुनिश्चित हो सके। यदि वह सिर्फ अपने मुविक्कल के मुखपत्र के रूप में काम करेगा तो वह खुद की ही प्रतिष्ठा को हानि पहुँचाता है।''


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