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राज्य ने की हो मनमानी तो अनुबंध के मामले में रिट याचिका है सुनवाई योग्य-सुप्रीम कोर्ट [आर्डर पढ़े]

Live Law Hindi
2 April 2019 9:16 AM GMT
राज्य ने की हो मनमानी तो अनुबंध के मामले में रिट याचिका है सुनवाई योग्य-सुप्रीम कोर्ट [आर्डर पढ़े]
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अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर सकती है हाईकोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सप्ताह एक बार फिर दोहराते हुए कहा है कि अनुबंध के मामलों में भी अगर राज्य की तरफ से कोई मनमानी की गई है तो हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पर सुनवाई कर सकती है।

जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन व जस्टिस विनित सरन की अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर सकती है हाईकोर्टखंडपीठ ने यह टिप्पणी उस अपील पर सुनवाई के दौरान की,जो हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी,हाईकोर्ट ने इस मामले में रिट पैटिशन को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए रिट पैटिशन खारिज कर दी थी कि मामले के तथ्यों को लेकर विवाद है ओर अनुबंध के पैसे को लेकर भी विवाद है।

इस मामले में दायर अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि-''हम चिंतित है क्योंकि इस मामले में हाईकोर्ट पूरी तरह गलत थी। मामले के तथ्यों को लेकर कोई विवाद नहीं है। बल्कि अपीलेंट को जो पैसा दिया जाना है,उस पर भी कोई विवाद नहीं है। वहीं यह भी साफ है कि अगर राज्य अपनी मनमानी करता है तो चाहे वो अनुबंध का ही मामला क्यों न हो,तो हाईकोर्ट भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप कर सकता है।''

कोर्ट ने कहा कि रिट पैटिशन में कहा गया था कि उत्तर प्रदेश जल निगम ने अतिरिक्त काम को स्वीकार कर दिया और उसे निगम के अनुसार पूरा भी कर दिया गया,परंतु उसके बाद भी अपीलेंट का पैसा नहीं दिया गया। इतना ही नहीं अनुबंधकर्ता निगम ने अपने जवाब में अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार भी कर लिया,परंतु कहा कि उनके पास पैसा नहीं है।

जिसके बाद खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश जल निगम को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के अंदर भुगतान कर दें।

कोर्ट ने इस मामले में एबीएल इंटरनेशनल लिमटेड एंड अन्य बनाम एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी काॅरपारेशन आॅफ इंडिया एंड अदर्स के फैसले का हवाला भी दिया। इस फैसले में कहा गया था कि-

अगर राज्य का कोई उपकरण या हिस्सा अपने संवैधानिक या वैधानिक उत्तरादायित्वों के तहत पब्लिक के अच्छे व भले के खिलाफ,अनुचित व अन्यायपूर्ण तरीके से काम करता है तो इसे संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मिली संवैधानिक गारंटी के विरूद्ध समझा जाता है। और यह प्रिंसीपल इस केस पर लागू होता है क्योंकि मामले का पहला प्रतिवादी राज्य का हिस्सा है।


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