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राजनीतिक प्रतिद्वंदी है,महज इस आधार पर नहीं दिया जा सकता है दुर्भावपूर्ण होने का तर्क-सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
31 March 2019 3:49 PM GMT
राजनीतिक प्रतिद्वंदी है,महज इस आधार पर नहीं दिया जा सकता है दुर्भावपूर्ण होने का तर्क-सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ इस आरोप पर राज्य द्वारा लिए गए किसी प्रशासनिक निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह राजनीतिक प्रतिद्वंदता के चलते दुर्भावपूर्ण भावना से लिया गया है।

वर्ष 1980 में तमिलनाडू राज्य ने एग्रीकल्चर होर्टिकल्चर सोसायटी को कुछ जमीन अलाॅट की थी। वर्ष 1989 में राज्य ने इस जमीन को यह कहते हुए वापिस ले लिया कि इस पर स्पोटर्स की सुविधाएं विकसित की जाएगी और ऐसा करते समय होर्टिकल्चर के विकास व पर्यावरण और रिसर्च पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। राज्य के इस आदेश को हाईकोर्ट के समम्क्ष चुनौती दी गई और कहा कि ऐसा दुर्भावपूर्ण नियत से किया जा रहा है। आरोप लगाया गया कि वह विपक्षी दल के सदस्य थे,इसलिए चुनी हुई पार्टी ने यह जमीन वापिस लेने का आदेश पास किया। परंतु मद्रास हाईकोर्ट ने इस रिट पैटिशन को खारिज कर दिया।

जस्टिस अभय मनोहर सपरे व जस्टिस दिनेश महेश्वरी की खंडपीठ ने कहा कि राज्य ने सिर्फ पब्लिक की भलाई के लिए जमीन वापिस लेने के अपने अधिकार का प्रयोग किया है और वह ऐसा कर सकता है। दुर्भावपूर्ण नियत के आरोप पर खंडपीठ ने कहा कि हमारे विचार में इस तरह का तर्क कानूनी तौर पर मान्य नहीं है। क्योंकि हमने पाया है कि अपीलेंट विपक्षी दल का सदस्य है,इसलिए यह आरोप लगाया गया है और उस समय सत्ता में रहने वाली पार्टी ने जमीन वापिस लेने का आदेश दिया था। बिना पर्याप्त व पुख्ता तथ्यों के इस तरह के आरोप के आधार पर दुर्भावपूर्णता का मामला नहीं बनता है।

अपील को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य इस बात को सुनिश्चित करे कि जमीन सिर्फ पब्लिक के हित के लिए प्रयोग की जाए और उसका कोई अन्य उपयोग न हो।


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