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पत्नी अगर व्यभिचार में नहीं है तो तलाक के बाद भी है भरण-पोषण पाने की हकदार, केरल हाईकोर्ट का आदेश

LiveLaw News Network
28 Sep 2019 5:28 AM GMT
पत्नी अगर व्यभिचार में नहीं है तो तलाक के बाद भी है भरण-पोषण पाने की हकदार, केरल हाईकोर्ट का आदेश
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‘‘सीआरपीसी की धारा 125 (4) के तहत, भरण-पोषण देने से इनकार करने के लिए ‘व्यभिचार में रहना’शब्द का प्रयोग किया गया है।’’

केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि जिस पत्नी को व्यभिचार के आधार पर तलाक दिया गया है, उसको भविष्य में गुजारा भत्ता देने के लिए केवल इस आधार पर मना किया जा सकता है कि वह अभी भी 'व्यभिचार में'रह रही है।

न्यायमूर्ति ए.एम शफीक और न्यायमूर्ति एन.अनिल कुमार की खंडपीठ ने पति को दिए गए उस तलाक के आदेश को बरकरार रखा है, जो पत्नी द्वारा 'व्यभिचार' करने के आधार पर दिया गया था। पीठ ने कहा कि महिला के भरण पोषण के दावे से इंकार करने और इस बात का संकेत देने के लिए कोई दलील नहीं दी गई कि उसकी पत्नी 'व्यभिचार' में रह रही है।

इस मामले में दिया गया तर्क यह था कि 'व्यभिचार में रहना',जिसका अर्थ है कि उसकी पत्नी को 'व्यभिचार में रहना'जारी रखना चाहिए, इस बात को जानते हुए भी कि इस दंपत्ति को व्यभिचार के आधार पर ही तलाक दिया गया था। पति द्वारा कोर्ट के समक्ष व्यभिचार का कोई एक ऐसा उदाहरण पेश कर देने और उसे साबित कर देने का मतलब यह नहीं है कि पत्नी अभी भी व्यभिचार में ही रह रही है।

पीठ ने कहा कि-

"हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 (1) (आई) के तहत, तलाक प्रदान किया जा सकता है, यदि विवाह पूर्ण होने के बाद, पति या पत्नी अपने जीवनसाथी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के साथ स्वैच्छिक संभोग करते हैं या संबंध बनाते हैं। धारा 13 (1) (आई) के तहत तलाक प्राप्त करने के लिए, किसी अन्य व्यक्ति के साथ स्वैच्छिक संभोग का एक उदाहरण भी पर्याप्त है, जबकि धारा 125 (4) के तहत रख-रखाव को अस्वीकार करने या देने से इंकार करने के लिए ''व्यभिचार में रहना'' शब्द का प्रयोग किया गया है।"

न्यायालय ने यह भी माना है कि जब मामले में इस बात के सबूत हों ,जिनसे यह साबित किया जा सके कि वह व्यभिचार में लिप्त थी, ऐेसे में उसे पिछली अवधि का भरण पोषण नहीं जा सकता है।

अपवित्रता का एक कृत्य या सदाचार या नैतिकता की कुछ खामियां एक पत्नी को भरण पोषण का दावा करने से विमुख नहीं कर सकती।

हाईकोर्ट ने हाल ही में दिए इस फैसले में ,वर्ष 1999 में दिए गए एक फैसले का हवाला दिया है,जिसमें कहा गया था कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत अपवित्रता का एक कृत्य या सदाचार या नैतिकता की कुछ खामियां एक पत्नी को उसके पति पर रख-रखाव का दावा करने से विमुख नहीं कर सकती है।

न्यायमूर्ति अलेक्जेंडर थॉमस ने एक पारिवारिक अदालत के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि- इस मामले में यह दलील भी दी गई है कि निचली अदालत ने 'व्यभिचार में रहने' की क्रिया या कार्य के गठन के लिए ने विभिन्न मामलों में दिए गए फैसलों सहित 'संधा बनाम नारायणन ,1999 (1)केएलटी 688' मामले में दिए गए फैसले पर विचार नहीं किया।

इन फैसलों के अनुसार इस तरह के आचरण में निरंतर रहना या व्यभिचारी या प्रेमी के साथ अर्ध-स्थायी मेल-जोल की स्थिति में रहना जरूरी है और आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत अपवित्रता का एक कृत्य या सदाचार या नैतिकता की कुछ खामियां एक पत्नी को उसके पति पर रख-रखाव का दावा करने से विमुख नहीं कर सकती हैं।

इस आदेश का पालन कई अन्य मामलों में भी किया गया है,जिनमें शीला व अन्य बनाम अल्बर्ट हेम्सन उर्फ जेम्स,2015(1) केएलटी एसएन 113 केस भी शामिल है। मामले में यह भी इंगित किया गया कि इस बात के सबूत रिकॉर्ड पर हैं,जिनसे यह साबित होता है कि याचिकाकर्ता अपने माता-पिता के साथ रह रही है। इसलिए याचिकाकर्ता द्वारा यह तर्क दिया गया कि दूर-दूर तक यह बताने के लिए कोई सबूत नहीं है कि याचिकाकर्ता किसी भी तरीके से व्यभिचार में रह रही थी।

इन पहलुओं को देखने के बाद इस कोर्ट का यह मानना है कि पारिवारिक अदालत ने उक्त महत्वपूर्ण पहलुओं पर न तो उचित रूप विचार किया और न ही इनका उल्लेख किया।

'संध्या बनाम नारायणन' में न्यायमूर्ति केएम शफी ने यह अवलोकन किया था-

'' वर्तमान सीआरपीसी की धारा 125 (4) और सीआरपीसी 1898 की धारा 488 (4) में उपयोग किए गए वाक्यांश 'व्यभिचार में रहने वाली' का अर्थ है कि व्यभिचारी या प्रेमी के साथ पत्नी की ओर से निरंतर आचरण या उसके साथ संलिप्त रहना, जैसा भी मामला हो सकता है। सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपवित्रता का एक कृत्य या सदाचार या नैतिकता की कुछ खामियां एक पत्नी को उसके पति पर रख-रखाव का दावा करने से विमुख नहीं कर सकती हैं।''



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