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अतिक्रमण के आरोप पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने प्रदूषण बोर्ड से कहा, आप इसे हटाकर उदाहरण क्यों नहीं स्थापित करते?

LiveLaw News Network
11 Nov 2019 7:58 PM GMT
अतिक्रमण के आरोप पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने प्रदूषण बोर्ड से कहा, आप इसे हटाकर उदाहरण क्यों नहीं स्थापित करते?
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कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सनिगोरुवाहल्लू झील पर अतिक्रमण कर इस पर अपने कार्यालय का निर्माण किया है। यह बात नीरी ने कर्नाटक हाईकोर्ट में कहा है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अभय ओका और कृष्ण कुमार की खंडपीठ ने कहा, आप (केएसपीसीबी) उदाहरण स्थापित कर क्यों नहीं अतिक्रमण को हटा देते हैं?"

अथॉरिटी की पैरवी कर रहे एडवोकेट गुरुराज जोशी ने यह निर्देश पाने के लिए समय की मांग की। जब सरकार को पता चला कि शहर की 19 झीलों में निजी और सरकारी एजेंसियों ने अतिक्रमण किया है, तो उसने इसका अध्ययन करने और इन झीलों को पुनर्जीवित करने का जिम्मा उसे सौंपा।

रिपोर्ट में कहा गया कि जिन 19 झीलों की जांच की गई उनमें से गंगाओंदा हल्ली की अंचे रमना केरे और बोम्मनहल्ली क्षेत्र के बेलकाहल्ली झीलों पर पूरी तरह कब्जा हो चुका है और इनमें सिर्फ 14 गुंटा एवं 36 गुंटा जमीन ही उपलब्ध है। उपलब्ध जमीन का प्रयोग फूलों के पार्क के रूप में विकसित किया जा सकता है।

कोएना अग्रहारा झील में 13 एकड़ वाला एक निजी संस्थान 20 एकड़ से अधिक क्षेत्र में बना है। पीठ ने बृहत बेंगलुरु महानगर पालिके (बीबीएमपी) को इस संस्थान का नाम बताने को कहा है और यह भी कि यह निर्माण कानूनी है कि नहीं। अदालत ने अथॉरिटीज को इन झीलों में किसी भी तरह का द्वीप बनाने से मना किया है और कहा है कि ऐसा करने के लिए अदालत की पूर्व अनुमति लेनी होगी।

इस बारे में जनहित याचिका सिटीजन एक्शन ग्रुप ने दायर किया है। पीठ ने याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य और बीबीएमपी को गायब हो रही झीलों को पुनर्जीवित करने के लिए कदम उठाने होंगे। अगर झीलों को पुनर्जीवित करना संभव नहीं है तो उसे कृतिम झील तैयार करने होने ताकि पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई की जा सके।

नीरी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सिर्फ दो झीलों – अरेहल्ली और थावराकेरे में ही मौसमी बारिश से होने वाला पानी मौजूद है। विकास गतिविधियों को अपनाकर इन झीलों में पानी को बचाया जा सकता है और वर्षा का पानी इनका एकमात्र जल स्रोत है। इन झीलों के लिए बीबीएमपी को विस्तृत सुझाव सौंपा जाएगा।

जून में पीठ ने कहा था :

प्रथम दृष्टया, यह पता चलता है कि राज्य सरकार और उसके प्राधिकरण बेंगलुरु में झीलों/तालाबों और अन्य जल स्रोतों को बचाने में पूरी तरह विफल रहे हैं। झीलों को गायब होने देना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है. झीलों/तालाबों के प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की है और वह इस जिम्मेदारी से यह कहकर नहीं बच नहीं सकती कि इनके प्रबंधन की जिम्मेदारी किसी अन्य प्राधिकरणों (बीबीएमपी) को सौंपा गया है।

अदालत को जो सूची सौंपी गई है उसके अनुसार, 19 झील ऐसे हैं जिनको अब झील नहीं कहा जा सकता और बस स्टेशन, स्टेडियम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ऑफिस, राजस्व क्वार्टर, केबीएच कॉलोनी और बीडीए लेआउट के रूप में इनका प्रयोग हो रहा है। निगम के अनुसार, बेंगलुरु शहर में 210 झील हैं। अदालत में अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी।



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