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एक्सप्लेनर : सीएए-एनपीआर-एनआरसी में क्या संबंध है?

LiveLaw News Network
28 Dec 2019 5:09 AM GMT
एक्सप्लेनर : सीएए-एनपीआर-एनआरसी में क्या संबंध है?
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2003 के नागरिकता नियमों को ही केवल पढ़ लेने से पता चलता है कि एनपीआर एनआरसी की नींव रखता है।

नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (सीएए) के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर, गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के बीच कोई संबंध नहीं है। यह टिप्पणी उसी दिन आयी जब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एनपीआर के लिए 3941.35 करोड़ रुपये के आवंटन को मंजूरी दी थी।

इसकी पृष्ठभूमि में आइए यह जानें कि क्या मौजूदा कानूनी ढांचे के आधार पर एनआरसी और एनपीआर के बीच कोई संबंध है या नहीं?

एनपीआर का अर्थ 'राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर' है, जिसका आधार नागरिकता कानून 1955 के तहत केंद्र सरकार द्वारा 2003 में तैयार 'नागरिकता (नागरिकों का पंजीकरण एवं राष्ट्रीय पहचान पत्र वितरण) नियम है। संयोग से, ये वही नियम हैं जो भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करते हैं। (इस बारे में नीचे और अधिक)

संबंधित नियमावली की नियम संख्या दो(एल) में 'जनसंख्या रजिस्टर' को इस प्रकार परिभाषित किया गया है:-

'जनसंख्या रजिस्टर' का मतलब है कि ऐसा रजिस्टर जिसमें गांव या ग्रामीण इलाके या शहर अथवा वार्ड या एक शहर या शहरी इलाके के वार्ड के तहत (नागरिक पंजीयन महापंजीयक द्वारा) सीमांकित क्षेत्र के निवासियों का ब्योरा उपलब्ध हो।"

महापंजीयक एवं जगनणना आयुक्त कार्यालय एनपीआर को 'देश के आम निवासियों की एक पंजी' के रूप में वर्णित करता है। एनपीआर के उद्देश्य से सामान्य निवासी वैसा व्यक्ति है जो एक स्थान पर पिछले छह माह या उससे अधिक समय तक रह चुका हो और वहां अगले छह महीने या उससे अधिक समय तक रहने का इरादा रखता हो।

2010 में एनपीआर के लिए प्रत्येक व्यक्ति के निम्नांकित जनसांख्यिकीय ब्योरे लिये गये थे :-

व्यक्ति का नाम

परिवार के मुखिया से संबंध

पिता का नाम

माता का नाम

पति/पत्नी का नाम (यदि विवाहित हों)

लिंग

जन्मतिथ

सामान्य आवास का मौजूदा पता

मौजूदा आवास पर नहले की अवधि

स्थायी आवासीय पता

पेशा/कार्य

शैक्षणिक योग्यता

एनपीआर कौन तैयार करता है?

एनपीआर का निर्माण केंद्र सरकार के तत्वावधान में किया जात है।

वर्ष 2004 की नागरिकता नियमावती के नियम तीन(चार) के तहत केंद्र सरकार वह तारीख तय करती है कि कब तक एनपीआर तैयार किया जाना है।

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के लिए पहली बार 2010 में तब आंकड़े इकट्ठा किये गये थे जब 2011 की जनगणना के लिए घरों को सूचीबद्ध करने का काम हुआ था।

2015 में घर-घर सर्वे करके इस आंकड़े को अद्यतन किया गया था। एनपीआर के लिए एक अप्रैल, 2020 से 30 सितम्बर 2020 तक पूरे देश में (असम को छोड़कर) सूचनाएं एकत्रित करने का काम शुरू करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 31 जुलाई 2019 को गजट अधिसूचना जारी की थी। भारत के रजिस्ट्रार जनरल एनपीआर के लिए राष्ट्रीय पंजीकरण अधिकारी के रूप में कार्य करते हैं। संयोग से, वही अधिकारी एनआरसी से संबंधित नागरिक पंजीयन के रजिस्ट्रार जनरल की भूमिका भी निभाता है।

एनपीआर और एनआरसी के बीच क्या अंतर है?

जनगणना एक ऐसी प्रक्रिया है, जो जनगणना अधिनियम 1948 के तहत अपनायी जाती है। जनगणना संबंधी डाटा व्यक्तियों द्वारा स्वघोषित जानकारी पर आधारित होता है, जिसका सत्यापन नहीं किया जाता।

एनपीआर वर्ष 2003 की नागरिकता नियमावली के तहत तैयार किया जाता है। इन नियमों के तहत, एक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है कि वह एनपीआर तैयार करने के लिए जानसांख्यिकीय डाटा साझा करे। इसलिए इन नियमों में दंडात्मक कारक मौजूद है, क्योंकि इस मामले में सहयोग न करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ जुर्माना एवं अर्थदंड का प्रावधान है।

एनपीआर डाटा संग्रहण संबंधी नियमों का अनुपालन करने में असफल रहने वाले व्यक्ति को नियम 17 के तहत दंड भुगतना पड़ सकता है।

गौरतलब है कि इन दोनों प्रक्रियाओं को एक ही कार्यालय की देखरेख में किया जाता है- भारत के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त का कार्यालय।

एनआरसी/एनआरआईसी क्या है?

एनआरसी/एनआरआईससी का अर्थ है- भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर

नागरिकता अधिनियम की धारा 14ए के तहत इसका आधार दिया गया है, जो अन्य बातों के अलावा कहता है-

केंद्र सरकार अनिवार्य रूप से भारत के प्रत्येक नागरिक का पंजीकरण कर सकती है और उसे राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी कर सकती है। केंद्र सरकार भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार कर सकती है और इस उद्देश्य के लिए एक राष्ट्रीय पंजीकरण प्राधिकरण की स्थापना कर सकती है।

2003 की नियमावली के नियम-तीन(एक) में कहा गया है कि महापंजीयक भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार करेंगे और उसका अनुरक्षण भी करेंगे। भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर को राज्य रजिस्टर, जिला रजिस्टर, उपजिला रजिस्टर तथा स्थानीय रजिस्टर के उपखंडों में विभाजित किया जायेगा।

क्या एनपीआर और एनआरसी में कोई संबंध है?

2003 की नियमावली को केवल पढ़ने से पता चलता है कि एनपीआर, एनआरसी की नींव रखता है।

एनपीआर से 'उचित सत्यापन'के बाद एनआरसी में लोगों का ब्योरा होगा। यह नियम- 3(5) से स्पष्ट है, जो कहता है:-

"(5) भारतीय नागरिक के स्थानीय रजिस्टर में व्यक्तियों का विवरण जनसंख्या रजिस्टर से उचित सत्यापन के बाद ही शामिल होगा।" नियम- 4(3) के अनुसार, एनआरसी के निर्माण के लिए एनपीआर में दर्ज विवरणों को सर्वप्रथम नागरिकों के स्थानीय रजिस्ट्रार से सत्यापित किया जाता है। इस सत्यापन के बाद 'संदिग्ध नागरिकों' के नाम हटाकर एनआरसी को अंतिम रूप दिया जाता है।

ये नियम स्थानीय रजिस्टर को एनपीआर के विवरणों के सत्यापन के बाद 'संदिग्ध नागरिकों' को चिह्नित करने का अधिकार प्रदान करते हैं।

नियम 4(4) कहता है :-

"सत्यापन प्रक्रिया के दौरान संदिग्ध नागरिकता वाले व्यक्तियों का विवरण स्थानीय रजिस्ट्रार द्वारा उचित टिप्पणी के साथ आगे की जांच के लिए जनसंख्या रजिस्टर में दर्ज किया जायेगा तथा संदिग्ध नागरिकता की स्थिति में निर्दिष्ट प्रपत्र के जरिये संबंधित व्यक्ति या उसके परिवार को सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के तुरंत बाद सूचित किया जायेगा।"

नाम हटाने से पहले संदिग्ध नागरिकों को अपना पक्ष रखने का एक मौका दिया जाता है। उसके बाद, स्थानीय इलाकों में एनआरसी का मसौदा प्रकाशित किया जाता है। लोगों को एनआरसी में शामिल किये जाने के खिलाफ अपनी आपत्तियां दर्ज कराने के लिए एक अवसर प्रदान किया जाता है। इसके बाद अंतिम एनआरसी प्रकाशित किया जाता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि एनपीआर और एनआरसी दोनों एक ही कार्यालय के तहत आते हैं (भारत के महापंजीयक नागरिकता पंजीकरण महापंजीयक के रूप में कार्य करते हैं।)

क्या एनपीआर एनआरसी की दिशा में पहला कदम है?

यह जरूरी नहीं कि एनपीआर एनआरसी का नेतृत्व करेगा। जैसा कि ऊपर कहा गया है, एनपीआर पहली बार 2010 में तैयार किया गया था और 2015 में इसका अद्यतन किया गया था। लेकिन एनआरसी के तहत ऐसा कदम नहीं उठाया गया।

हालांकि, 2003 के नियमों के अनुसार, एनआरसी की तैयारी केवल एनपीआर के बाद ही की जा सकती है। इस प्रकार, एनपीआर एनआरसी के लिए आवश्यक पूर्व शर्त है।

मौजूदा सरकार ने कई मौकों पर पूरे देश में एनआरसी लाने के अपने मंसूबे व्यक्त किये हुए हैं। यहां तक कि नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019 पर संसद में चर्चा के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रव्यापी एनआरसी तेयार कराने के इरादे का इजहार किया था।

प्रेस विज्ञप्तियों में जारी बयानों, संसद में दिये गये जवाबों तथा जनगणना विभाग के दस्तावेजों के माध्यम से इस बात के संकेत कई मौकों पर दिये जा चुके हैं कि एनपीआर 2020 एनआरसी के लिए पहले कदम के तौर पर लाया जा रहा है।

ऐसी खबरें हैं कि 2020 के एनपीआर के लिए प्रश्नावली 2010 के एनपीआर प्रश्नावली से अलग हैं। 2020 एनपीआर की अनुसूची में 2010 के एनपीआर के लिए मांगे गये (उपरोक्त) विवरणों के अलावा व्यक्ति के माता-पिता की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान का विवरण भी पूछा गया है।

नागरिकता अधिनियम 1955 में 1987 एवं 2003 में किये गये संशोधन के बाद एक व्यक्ति के माता-पिता की नागरिकता जन्म से ही उस व्यक्ति की नागरिकता साबित करने का एक निर्धारित कारक है। यह एनपीआर और संभावित एनआरससी के बीच सांठगांठ दिखाने वाला एक अतिरिक्त कारक हो सकता है।

एनआरसी समस्यामूलक क्यों है?

वर्षों से भारत में रह रहे एक व्यक्ति को प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष दस्तावेजों के आधार पर नागरिकता साबित करने के लिए कहना क्रियान्वयन के स्तर पर खुद में समस्यामूलक हो सकता है।

इससे नौकरशाही का जुल्म और निरंकुशता बढ़ सकती है, खासकर तब जब भारतीय आबादी का एक बडा वर्ग अशिक्षित और पिछड़ा हुआ है।

हाल ही में असम में सम्पन्न एनआरसी की प्रक्रिया इस बात का उदाहरण है, जहां करीब 20 लाख व्यक्ति इससे बाहर रह गये हैं। ऐसी खबरें हैं कि उस प्रक्रिया में कई तरह की खामियां थीं, जिसके कारण लोगों के नाम जानबूझकर सूची से अलग कर दिये गये।

2003 के नियम 'संदिग्ध नागरिक' की श्रेणी बनाते हैं (देखें पारा 4.3), एक ऐसी विचित्र श्रेणी जो सहज रूप से आत्मपरक है एवं प्रशासकीय व्याख्या के लिए खुला भी। इस बात के लिए कोई दिशानिर्देश नहीं है कि 'संदिग्ध नागरिक' के रूप में चिह्नित करने के स्वतंत्र विशेषाधिकार का इस्तेमाल कैसे किया जाये?

नियम इस बारे में भी कुछ नहीं कहते कि यदि आप संदिग्ध पाये जाते हैं तो क्या होगा? लेकिन विदेशी (न्यायाधिकरण) आदेश 1964 में 2019 में किये गये संशोधन के तहत जिला मजिस्ट्रेट को यह अधिकार दिया गया है कि वह संदिग्ध नागरिक के मामले को विदेशी न्यायाधिकरण को सौंप सकता है।

नियमों में एक और प्रावधान जो बहुत सारी परेशानियों का कारण बन सकता है, वह है नियम 4(6)(ए), जो किसी भी व्यक्ति को स्थानीय नागरिक रजिस्टर में किसी भी व्यक्ति को शामिल करने के खिलाफ आपत्ति दर्ज करने में सक्षम बनाता है। यह एक समस्यामूलक प्रावधान हो सकता है, जिसके दुरुपयोग की व्यापक आशंकाएं हैं।

विदेशी न्यायाधिकरण अर्ध-न्यायिक निकाय हैं जहां कार्यकारी अधिकारी बगैर औपचारिक न्यायिक प्रशिक्षण के कार्य करते हैं। ऐसी खबरें हैं कि विदेशी न्यायाधिकरण लापरवाहीपूर्वक एवं संवेदनहीन तरीके से कार्य करते हैं और बिना कारण के आदेश पारित करते हैं।

मौजूदा कानून के अनुसार, नागरिकता साबित करने का अधिकार संबंधित व्यक्ति पर ही होता है।

इसलिए एनआरसी अधिकारियों के विवेकाधीन अधिकारों के दुरुपयोग का परिणाम दुष्कर हो सकता है, जैसे- वह व्यक्ति गैर-कानूनी घोषित हो सकता है।

यह ज्यादातर भारतीयों के लिए विनाशकारी हो सकता है जो पहले से कोई सुविधा हासिल कर रहे हैं, या सामाजिक अधिकार जिन्हें प्राप्त हैं।

चूंकि एनआरसी के बारे में कोई आधिकारिक अधिसूचना नहीं हुई है, इसलिए यह कहना असामयिक होगा कि नागरिकता साबित करने के लिए कौन सा दस्तावेज पर्याप्त होगा। फिर भी, एनआरसी नियमों का प्रारूप एक आम आदमी को प्रशासनिक अधिकारियों की दया पर छोड़ देता है जो अपने अधिकारों का निरंकुश इस्तेमाल करके संबंधित आदमी के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।

क्या सीएए और एनआरसी में कोई संबंध है?

सीएए और एनआरसी में प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, लेकिन 2019 के चुनाव प्रचार के दौरान अमित शाह ने टिप्पणी की थी कि सरकार एनआरसी लायेगी, उसके बाद के कालखंड में सीएए भी आएगा। जब देश भर में सीएए के खिलाफ विरोध तेज हो गया, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत रविवार को कहा कि एनआरसी पर कोई चर्चा नहीं हुई।

सीएए कम से कम उन लोगों को सहयोग पहुंचाने में सहायक साबित हो सकता है, जिनका नाम संभावी राष्ट्रव्यापी एनआरसी से बाहर होगा, बशर्ते यह साबित कर दें कि वे गैर-मुस्लिम प्रवासी नागरिक हैं तथा बंगलादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से धर्म के आधार पर अभियोजन झेलने के कारणा वहां से भागकर 31 दिसम्बर 2014 से पहले भारत आ गये हों। असम एनआरसी सूची पर सीएए के संभावित प्रभाव एक ऐसा मामला है, जिस पर अत्यधिक चर्चा की जायेगी।

(शिक्षक/कार्यकर्ता और 'इन द पब्लिक्स इंटरेस्ट: एविक्शन्स, सिटिजनशिप एंड इनएक्वेलिटी इन कंटेमपरैरी दिल्ली (2016) के लेखक गौतम भान के इन्पुट के साथ)

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