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वालयार बलात्कार और मौत मामला- POCSO कोर्ट ने अन्य 3 आरोपियों को बरी किए जाने के कारण बताए

LiveLaw News Network
4 Nov 2019 4:15 AM GMT
वालयार  बलात्कार और मौत मामला- POCSO कोर्ट ने अन्य 3 आरोपियों को बरी किए जाने के कारण बताए
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वालयार में दो सगी बहनों से बलात्कार व उनकी मौत के मामले में केरल के पलक्क्ड़ जिले में स्थित प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायालय द्वारा 25 अक्टूबर को दिए गए फैसले की प्रतियां शुक्रवार को जारी कर दी गई है। इस फैसले में अदालत ने मामले के बाकी तीन आरोपियों को भी बरी कर दिया था, जबकि मामले के एक आरोपी को 30 सितम्बर को दिए गए फैसले के तहत ही बरी किया जा चुका है।

यह था मामला

मामला दो बहनों की मौत का था, जिनका यौन शोषण हुआ था। बड़ी बहन जो 13 साल की थी, वह 13 जनवरी, 2017 को अपने घर में फांसी पर लटकी पाई गई थी। इस घटना के दो महीने के बाद 9 साल की उसकी छोटी बहन भी 4 मार्च, 2017 को अपने घर में फांसी पर लटकी पाई गई थी।

पुलिस के अनुसार, आरोपी व्यक्तियों द्वारा किए गए असहनीय यौन उत्पीड़न के कारण लड़कियों ने आत्महत्या कर ली थी। मामले में एक किशोर समेत पांच आरोपी थे।

पहली बहन के मामले में पुलिस ने सभी आरोपियों - प्रदीप कुमार, वलिया मधु, कुट्टी मधु, शिबू और किशोर के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया था, जबकि दूसरी बहन के मामले में सिर्फ तीन आरोपी प्रदीप कुमार, वलिया मधु और किशोर के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया था। नाबालिग अभियुक्त के खिलाफ कार्रवाई किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष लंबित है।

निचली अदालत ने 30 सितंबर को दिए गए फैसले में आरोपी प्रदीप कुमार को दोनों मामलों में बरी कर दिया था। (उन फैसलों के बारे में रिपोर्ट यहां और यहां पढ़ी जा सकती है)।

बाकी तीन आरोपियों को बरी करने के लिए सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए कारणों का उल्लेख नीचे किया गया है।

वलिया मधु बड़ी बहन के मामले में

इस मामले में आरोपी पर भारतीय दंड संहिता के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने और बिना सहमति के अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने और POCSO अधिनियम ( प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट) के तहत एनल पेनिट्रेशन यौन शोषण का मामला बनाते हुए आरोप पत्र दायर किया गया था।

यह स्थापित करने के लिए कि आरोपी ने लड़की का यौन शोषण किया था, अभियोजन पक्ष ने निम्नलिखित साक्ष्य को पेश किया -

लड़की के सौतेले पिता, जिसकी गवाही PW5 (अभियोजन पक्ष के गवाह नंबर 5) के रूप में करवाई गई। उसने बताया कि एक दिन उसने देखा कि आरोपी लड़की के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बना रहा था।

PW6 के रूप लड़की की मां की गवाही करवाई गई, जिसने बताया कि एक दिन उसने आरोपी को लड़की से छेड़छाड़ करते देखा था।

PW7 के रूप में पेश लड़की की दादी ने कहा कि उसने आरोपी को लड़की के साथ दुर्व्यवहार करते देखा था (लेकिन वह मामले की सुनवाई या परीक्षण के दौरान अपने बयान से मुकर गई।)

PW8 के रूप में पेश लड़की की एक सहेली ने बताया कि पीड़िता ने उसे बताया था कि आरोपी उसका शोषण कर रहा है।

अदालत ने हालांकि पीड़िता के सौतेले पिता और मां को मामले के चश्मदीद गवाह मानने से इंकार कर दिया। चूंकि पुलिस को दिए अपने शुरुआती बयानों में, उन्होंने ऐसा कुछ नहीं बताया था कि उन्होंने आरोपी को पीड़ित का यौन शोषण करते हुए देखा था।

जज के मुताबिक, मार्च 2017 में दूसरी लड़की की मौत होने के बाद जब नए जांच अधिकारी को जांच का जिम्मा सौंपा गया, तब नए जांच अधिकारी ने फिर से बयान दर्ज किए थे। उस समय दर्ज किए गए बयानों में यह बताया गया था कि आरोपी ने पीड़िता का यौन शोषण किया था।

अदालत ने उनके इस स्पष्टीकरण को ध्यान में नहीं रखा कि उन्होंने लड़की की भलाई की चिंता के चलते इस घटना को दबा लिया था।

न्यायाधीश मुरली कृष्ण एस ने अपने फैसले में कहा कि,

''PW5 और PW6 वास्तव में अपनी बेटी की भलाई बारे में चिंतित थे तो उनको निश्चित रूप से आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी, कम से कम पीड़ित की मौत के बाद तो ऐसा किया जाना चाहिए था।''

अदालत ने यह भी कहा कि किस समय उन्होंने अभियुक्त को यौन शोषण करते देखा, इस संबंध में भी उनके बयानों में विरोधाभास था। कोर्ट ने कहा कि इस बात की भी संभावना है कि जब जांच डिप्टी एसपी एम.जे सोजन ने अपने हाथ में ली थी तो उसके बाद ही उनके बयानों में हेरफेर किया गया हो।

अदालत ने PW8 के बयानों को यह कहते हुए नकार दिया कि उसका बयान सुनी-सुनाई बातों या अफवाह पर आधारित हैं। कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 6 के तहत रिस गस्टे का सिद्धांत इस गवाह के बयान या साक्ष्य पर लागू नहीं होता, क्योंकि पीड़िता द्वारा किया गया खुलासा उसकी मौत के साथ समकालीन या समसामयिक नहीं था।

अदालत ने कहा कि पीड़ित लड़की ने PW6 के समक्ष जो बात कही थी, उसे धारा 32 के तहत मरने से पहले दिए गए बयान के रूप में स्वीकार्य नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह बयान मृत्यु के पूर्वानुमान या मौत से पूर्व सोच-समझकर नहीं दिया गया था।

पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के बयान

जिस डॉक्टर ने पोस्टमार्टम किया था, उसने प्रति-परीक्षण के दौरान कहा था कि लड़की की गुदा में चोट का कारण जरूरी नहीं है कि उसका एनल पेनिट्रेशन हुआ था। इन चोट का कारण बवासीर का संक्रमण भी हो सकता है। यह बयान आरोपी के पक्ष में संतुलन बनाता है। अदालत ने यह भी कहा कि अभियुक्त को अपराध से जोड़ने के लिए कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं था।

कुट्टी मधु ,बड़ी बहन के मामले में

इस मामले में इस आरोपी पर आत्महत्या के लिए उकसाने और यौन शोषण के आरोप लगाए गए थे। कुट्टी मधु लड़की की मां का रिश्तेदार था। PW4 के रूप में लड़की की मां ने बताया था कि छोटी लड़की के जन्मदिन के उत्सव के बाद रात को आरोपी उनके घर पर रुका था। उस रात, जब वह कुछ शोर सुनकर उठी, तो उसने देखा कि वह बड़ी बहन को निर्वस्त्र करने का प्रयास कर रहा है। उसने तुरंत आरोपी को झाड़ू से पीटा और घर से भगा दिया।

PW3 के रूप में लड़की के सौतेले पिता ने अदालत को बताया कि उसने उस दिन अपनी पत्नी को आरोपी को झाड़ू से पीटते हुए देखा था। जब उसने ऐसा करने का कारण पूछा तो उसकी पत्नी ने उसे आरोपी के विकृत कार्य के बारे में बताया। अदालत ने हालांकि उनके बयानों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि इन घटनाओं का जिक्र उनके उस बयान में नहीं था जो पहले जांच अधिकारी को दिए गए थे।

अदालत ने कहा कि,

''जांच अधिकारियों द्वारा दिए गए साक्ष्य और उनके द्वारा PW3 और PW4 के बयानों की भौतिक चूक के अंतर्विरोधों को स्वीकार करना, यह दर्शा रहा है कि अदालत के समक्ष इन गवाहों द्वारा दिए गए बयानों में सुधार किया गया था। इससे इन गवाहों की सत्यता और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा होता है।''

कोर्ट ने यह भी कहा कि गवाहों के प्रति-परीक्षण से पता चला है कि पहली बेटी की मौत के बाद भी, PW3 और PW4 आरोपी के साथ करीबी संबंध बनाए हुए थे। अदालत ने कहा कि परिस्थितियों ने उनके द्वारा पुलिस को बाद में दिए गए बयानों की वास्तविकता के बारे में संदेह पैदा कर दिया है।

अदालत ने यह भी कहा कि,''संभावनाओं के आधार पर एक आपराधिक मामले का फैसला नहीं किया जा सकता है। मामले में पुख्ता सबूत होने चाहिए, जो कि अनायास ही आरोपी द्वारा अपराध करने की तरफ इशारा करते हों। ऐसे सबूत या तो प्रत्यक्ष साक्ष्य हो सकते हैं या परिस्थितिजन्य साक्ष्य ,परंतु इस मामले में ऐसे सबूतों की अनुपस्थिति देखी गई है।''

शिबू, बड़ी बहन के मामले में

शिबू पर आत्महत्या के लिए उकसाने और लड़की के यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था। अभियोजन पक्ष ने जिस मुख्य साक्ष्य पर भरोसा किया था वह अभियुक्त द्वारा सौतेले पिता के सामने दिया गया वह बयान था जिसमें उसने लड़की का यौन उत्पीड़न करने की बात स्वीकारी थी।

दूसरी बेटी की मौत के एक दिन बाद जब आरोपी, लड़की के सौतेले पिता के साथ शराब का सेवन कर रहा था, उस समय उसने यह बयान दिया था। हालांकि अदालत ने इस गवाही को तवज्जो नहीं दी। अदालत ने कहा कि सौतेले पिता ने इस स्वीकारोक्ति के बारे में पहले जांच अधिकारी के समक्ष कुछ नहीं बताया था, इसलिए न्यायालय ने माना कि अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति विश्वसनीय और स्वीकार्य नहीं थी।

वलिया मधु, छोटी बहन के मामले में

पीड़िता की मां के रिश्तेदार वलिया मधु, बड़ी बहन के मामले में भी आरोपी था। छोटी बहन के मामले में, पीड़ित की उम्र और उसकी लंबाई को देखते हुए डाक्टर ने शव परीक्षण रिपोर्ट में होमिसाइडल हैंगिंग याने मारकर फांसी पर लटकाने की संभावना जताई गई थी।

हालांकि पुलिस ने इस एंगल से जांच नहीं की और मामले को आत्महत्या बताते हुए आरोप पत्र दायर किया। कोर्ट ने कहा कि हो सकता है कि लड़की ने कमरे में टूटी कुर्सी या लकड़ी की खाट का इस्तेमाल करके घर की छत से फांसी लगाई हो।

अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की मां और पिता के साक्ष्यों पर भरोसा करते हुए कहा कि चूंकि उनकी बड़ी बेटी का आरोपियों द्वारा यौन शोषण किया गया था, इसलिए छोटी बेटी के साथ भी इस तरह का अपराध करने की आशंका है।

अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि अदालत को ऐसा लगा कि गवाह विश्वसनीय नहीं थे। अदालत ने कहा कि इस बात की भी संभावना है कि नए जांच अधिकारी द्वारा जांच अपने हाथ में लेने के बाद गवाहों के बयानों में हेरफेर किया गया हो।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि-

''यह स्पष्ट है कि परिस्थितियों की श्रृंखला में अभियोजन पक्ष द्वारा केवल दो परिस्थितियों को साबित किया जा सका। पहला यह कि अभियुक्त पीड़ित लड़की का रिश्तेदार है और दूसरा यह है कि अभियुक्त को पीड़ित के खिलाफ अपराध करने का अवसर मिला था। भले ही लड़की उसके घर आई हो तब या जब आरोपी लड़की के घर गया था।

लेकिन आरोपी को कथित अपराधों से जोड़ने के लिए किसी अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य का अभाव है, इसलिए मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे अभियुक्त के खिलाफ कथित अपराधों को साबित करने में विफल रहा है।''


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