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दो बच्चों का नियम : अयोग्य पार्षद ने तीसरे बच्चे को अस्वीकार करने की कोशिश की, सुप्रीम कोर्ट ने मानने से इनकार किया

LiveLaw News Network
14 July 2021 8:42 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट

महाराष्ट्र की एक नगर निगम पार्षद ने तीसरे बच्चे को किसी और का बच्चा बताकर दो बच्चों के नियम का उल्लंघन करने की अयोग्यता को दूर करने का प्रयास किया।

हालांकि, तीसरे बच्चे को 'अस्वीकार' करने का प्रयास असफल रहा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी उक्त बचाव को खारिज कर दिया था।

2017 में सोलापुर नगर परिषद में अनीता रामदास मागर नाम की एक महिला के चुनाव से संबंधित मुद्दा उठा था। उनके चुनाव को एक प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार ने इस आधार पर चुनौती दी थी कि 1 सितंबर, 2001 के बाद उनको एक तीसरा बच्चा पैदा हुआ था, जिस तारीख को महाराष्ट्र स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को अयोग्य घोषित करने का प्रावधान पेश किया गया।

ट्रायल कोर्ट ने पाया कि अनीता मागर ने 2004 में एक बेटी को जन्म दिया था। इसलिए, ट्रायल कोर्ट ने महाराष्ट्र नगर निगम अधिनियम, 1949 की धारा 10 (1) (i) के तहत उसे अयोग्य ठहराते हुए उसका चुनाव रद्द कर दिया।

उसका तर्क था कि तीसरे बच्चे का जन्म दूसरे परिवार में हुआ था। उसके पति के भाई और उनकी पत्नी को विवादित तीसरे बच्चे के माता-पिता होने का अनुमान लगाया गया था। बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र में किए गए सुधारों पर यह तर्क देने के लिए भरोसा किया गया कि तीसरे बच्चे के माता-पिता एक अलग दंपति था।

ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने कहा कि तीसरे बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र में शुरू में अनीता मागर और उसके पति को माता-पिता के रूप में दिखाया गया था। माता-पिता के रूप में एक अलग दंपति को दिखाने के लिए, 2012 में बच्चे के जन्म के आठ साल बाद जन्म प्रमाण पत्र बदल दिया गया था। यह परिवर्तन अनीता मागर के पति द्वारा 2012 में वार्ड चुनाव लड़ने के लिए नामांकन दाखिल करने से कुछ समय पहले किया गया था। बदले हुए प्रमाण पत्र के आधार पर, रिटर्निंग ऑफिसर ने 2012 में अनीता मागर के पति के खिलाफ उठाई गई इसी तरह की आपत्ति को खारिज कर दिया था।

हालांकि, ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने जन्म प्रमाण पत्र में बदली हुई प्रविष्टियों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जो कि देरी से बनाई गई थीं। साथ ही, 2004 में अस्पताल से दी गई प्रासंगिक सूचना में अनीता मागर और उसके पति को माता-पिता के रूप में दिखाया गया था।

अदालतों ने यह भी नोट किया कि स्कूल के रिकॉर्ड से पता चला है कि तीसरा बच्चा अनीता मागर और उसके पति का था। यह दिखाने के लिए सबूत थे कि वो उसके स्कूल में प्रवेश के समय उसके माता-पिता के रूप मेंथे और उन्होंने स्कूल से संबंधित मामलों में उस क्षमता में कार्य करना जारी रखा था।

उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सीवी भडांग की एकल पीठ ने अनीता मागर के चुनाव को रद्द करने वाले दीवानी न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा।

"सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, ट्रायल कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि पूनम सुनीता और दत्तात्रेय मागर की बेटी थी। रिकॉर्ड पर पर्याप्त सबूत हैं कि वह याचिकाकर्ता और उसके पति से पैदा हुई बेटी थी, " उच्च न्यायालय ने कहा।

12 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने इसके खिलाफ दायर की गई मागर की विशेष अनुमति याचिका को खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा,

"हम इस आदेश में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं। विशेष अनुमति याचिका तदनुसार खारिज की जाती है।"

(मामला: सौ.अनीता रामदास मागर बनाम सौ.भागलक्ष्मी प्रकाश महंत और अन्य)

आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:



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