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पंचायत चुनाव में दो बच्चों की नीति : सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका पर नोटिस जारी किया, हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार

LiveLaw News Network
24 Sep 2019 9:12 AM GMT
पंचायत चुनाव में दो बच्चों की नीति : सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका पर नोटिस जारी किया, हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार
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उच्च न्यायालय के पंचायती राज चुनाव में 2 बच्चों से अधिक होने पर अयोग्य करार देने के फैसले को चुनौती देने वाली उत्तराखंड सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने को लेकर सहमति तो जताई है लेकिन फिलहाल उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है।

सोमवार को न्यायमूर्ति एन. वी. रमना, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने उत्तराखंड सरकार द्वारा दायर विशेष अवकाश याचिका पर नोटिस जारी किया लेकिन 5 अक्टूबर को होने वाले पंचायत चुनाव की प्रक्रिया में दखल देने से इनकार कर दिया।

क्या है उत्तराखंड उच्च न्यायालय का हालिया फैसला

दरअसल उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड पंचायती चुनाव में हाल ही में पेश किए गए प्रावधान के संदर्भ में फैसला दिया था कि पंचायती राज चुनाव में 2 से अधिक जीवित बच्चों वाले किसी व्यक्ति को अयोग्य ठहराए जाने का पंचायती राज अधिनियम केवल उन मामलों पर लागू होगा जहां 25.07.2019 के बाद तीसरा बच्चा पैदा हुआ है।

उच्च न्यायालय का फैसला उत्तराखंड पंचायती राज (संशोधन) अधिनियम, 2019 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली रिट याचिकाओं पर आया था, जिसे इस वर्ष 25 जुलाई को अधिसूचित किया गया था। संशोधित अधिनियम की धारा 8 (1) (आर) में कहा गया है कि अगर किसी के पास 2 से अधिक जीवित बच्चे हैं तो व्यक्ति को 'प्रधान', 'उप-प्रधान' और ग्राम पंचायत का सदस्य होने के लिए अयोग्य घोषित किया जाएगा।

मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आलोक कुमार की पीठ ने अधिनियम की धारा 8 (1) (आर) को पढ़कर स्पष्ट किया था कि इस प्रावधान के तहत उन लोगों को अयोग्य नहीं माना जाएगा जिनके पास 25.07. 2019 से पहले 3 या अधिक बच्चे हैं।

उच्च न्यायालय ने माना था कि धारा 8 (1) (आर) सभी धार्मिक धर्मों के लोगों के लिए लागू है। ये अल्पसंख्यक विरोधी नहीं है और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत उल्लिखित धार्मिक अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन नहीं करता है। पीठ ने याचिकाओं में उठाए गए उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि यह शर्त उन लोगों पर कठोर रूप से लागू होगी जिनके पास दूसरी गर्भावस्था में जुड़वा बच्चे हैं। किसी बच्चे के जन्म के लिए या दूसरी गर्भावस्था के दौरान जुड़वां बच्चे, ईश्वर का कार्य है। अदालत ने माना था कि ये असाधारण स्थिति भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत एक कानून की घोषणा नहीं कर सकती है।

इस प्रावधान को पढ़ते हुए उच्च न्यायालय ने कहा था कि लोगों को तीसरे बच्चे को जन्म देने से रोकने और परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन लोगों के संबंध में कोई उपलब्धि नहीं होगी जिनके पास पहले से ही 3 या अधिक बच्चे हैं, क्योंकि अपने बच्चों की संख्या कम करने के लिए वो कुछ नहीं कर सकते।

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