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2019 में अवकाश के दिनों में सुप्रीम कोर्ट में हुई चौथी सुनवाई 

LiveLaw News Network
25 Nov 2019 5:37 AM GMT
2019 में अवकाश के दिनों में सुप्रीम कोर्ट में हुई चौथी सुनवाई 
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 सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन की याचिका पर रविवार को सुनवाई इस साल चौथी घटना है जब शीर्ष अदालत ने छुट्टी के दिन में विशेष सुनवाई की। इससे पहले भी साल 2019 में अवकाश के दिन कोर्ट ने सुनवाई की है।

शीर्ष अदालत ने 20 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट की ही एक पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद शनिवार को एक असाधारण सुनवाई की थी।

बाद में 9 नवंबर को शनिवार के दिन अयोध्या में जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की पीठ ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया और देवता रामलला को अयोध्या में पूरे 2.77 एकड़ विवादित भूमि को मंजूरी दे दी।

इस बीच दशहरे की छुट्टियों में 7 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के आरे इलाके में मेट्रो कार शेड के लिए पेड़ों की कटाई के खिलाफ कानून के छात्र की मुख्य न्यायाधीश को लिखी चिट्ठी के आधार पर स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई की थी। यह चौथा उदाहरण है जब इस साल सुप्रीम कोर्ट ने अवकाश होने के बावजूद सुनवाई की।

दरअसल शनिवार रात को शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के गठबंधन ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी जिसमें भाजपा के देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री के रूप में आमंत्रित करने के महाराष्ट्र के राज्यपाल के फैसले को रद्द करने की मांग की गई थी और " हॉर्स ट्रेडिंग" से बचने के लिए तत्काल फ्लोर टेस्ट कराने की मांग की थी।रजिस्ट्री ने मामले को रविवार को सुनवाई के सूचीबद्ध किया था।

पहले के उदाहरण

पिछले साल मई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने आधी रात को उस मामले की सुनवाई की थी जब कांग्रेस-जेडीएस ने राज्यपाल द्वारा भाजपा को कर्नाटक में सरकार बनाने के निमंत्रण को चुनौती दी थी।

इससे पहले 29 जुलाई, 2015 को शीर्ष अदालत ने अगले दिन सुबह 6 बजे होने वाली 1993 मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की फांसी की सजा पर रोक लगाने वाली याचिका पर विचार करने के आधी रात से लेकर सुबह तक सुनवाई की थी।

1985 में कड़े FERA कानून के तहत आरोपी एक प्रमुख व्यवसायी की जमानत याचिका पर सुनवाई के लिए शीर्ष अदालत के दरवाजे आधी रात को खोले गए थे।सुप्रीम कोर्ट की इस मामले में जबरदस्त आलोचना की थी जब तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ई एस वेंकटरामैया को आधी रात को जगाया गया और उद्योगपति एल एम थापर को जमानत देने के लिए सुनवाई की गई। थापर को भारतीय रिजर्व बैंक की शिकायत के आधार पर गिरफ्तार किया गया था कि उनके द्वारा चलाई गई कई कंपनियों ने तत्कालीन विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (फेरा) का उल्लंघन किया था।

अयोध्या में राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद 6 और 7 दिसंबर, 1992 की मध्यरात्रि को जज के आवास पर आधी रात को सुनवाई जारी रही।

अयोध्या मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एम एन वेंकटचलैया ने की थी, जो बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश बने। उस मामले में, कारसेवकों द्वारा ढांचे को गिराए जाने के तुरंत बाद अयोध्या विवाद के पक्षकारों में से एक अदालत पहुंच गया था।

सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाली पीठ ने निर्देश दिया था कि विवादित स्थल पर यथास्थिति बरकरार रखी जानी चाहिए।

वैसे याकूब मेमन मामले की तरह ऐसे अन्य उदाहरण भी हैं जिनमें याचिकाओं को उनकी मौत की सजा पर रोक लगाने के लिए देर शाम को याचिका दायर की गई।

राजधानी के कुख्यात रंगा-बिल्ला मामले में न्यायमूर्ति वाई वी चंद्रचूड़, जो 22 फरवरी, 1978 से 11 जुलाई, 1985 तक भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद पर रहे, उस याचिका पर विचार करने के लिए देर रात बैठे कि उन्हें फांसी नहीं होनी चाहिए।

इस तरह की याचिकाओं में नोएडा के निठारी हत्याकांड के दोषी सुरिंदर कोली का मामला भी था जब शीर्ष अदालत ने उसकी मौत की सजा पर रोक लगाने के लिए उनकी ओर से देर रात सुनवाई की और रोक लगाई।

इस तरह की एक और सुनवाई 9 अप्रैल, 2013 को हुई थी, जब मंगनलाल बरेला की ओर से एक हत्या के मामले में उसकी मौत की सजा के खिलाफ याचिका दायर की गई थी।

शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ के मामले में, सुबह 10 बजे 16 लोगों के खिलाफ मौत की सजा को चुनौती दी गई और वकीलों ने इस याचिका के साथ भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम के निवास पर याचिका दायर की। CJI और न्यायमूर्ति एम वाई इकबाल ने करीब 11.30 बजे मामले की सुनवाई की और लगभग आधी रात को फांसी पर रोक का आदेश दिया।

जानकारों के मुताबिक 1998 में उत्तर प्रदेश में एक समग्र फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया गया था जिसमें यह निर्धारित किया जाना था कि बहुमत कल्याण सिंह के पास है या जगदंबिका पाल के पास।

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