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देश में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, दो बच्चों की नीति समेत कई कदम उठाने की मांग

LiveLaw News Network
20 Nov 2019 5:11 AM GMT
देश में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, दो बच्चों की नीति समेत कई कदम उठाने की मांग
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देश की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए दो बच्चों की पॉलिसी सहित कुछ कदमों को लागू करने की मांग करने वाली जनहित याचिका को खारिज करने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

भारतीय जनता पार्टी के नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर अपील में 3 सितंबर के उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई है जिसमें कहा गया था कि यह कानून बनाने का काम संसद और राज्य विधानसभाओं का है ना कि अदालत का।

याचिका में दिए गए तर्क

शीर्ष अदालत में दायर याचिका में कहा गया है कि आदेश पारित करते समय उच्च न्यायालय इस बात की सराहना करने में विफल रहा कि स्वच्छ हवा का अधिकार, पीने के पानी का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, शांतिपूर्ण नींद का अधिकार, आश्रय का अधिकार, आजीविका का अधिकार और शिक्षा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 और 21 ए के तहत गारंटीकृत है और जनसंख्या विस्फोट को नियंत्रित किए बिना सभी नागरिकों को ये अधिकार सुनिश्चित नहीं जा सकता है।

"उच्च न्यायालय इस बात की सराहना करने में विफल रहा कि एक विस्तृत चर्चा, बहस और प्रतिक्रिया के बाद, प्रविष्टि 20 वीं-ए को 1976 में संविधान में 42 वें संशोधन के माध्यम से 7 वीं अनुसूची की सूची III में डाला गया, जो केंद्र और राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन पर कानून को अधिनियमित करने की अनुमति देता है, "याचिका में कहा गया है।

यह भी कहा गया कि उच्च न्यायालय इस बात की सराहना करने में भी विफल रहा कि एक व्यापक चर्चा के बाद, 31 मार्च, 2002 को भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएन वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाले सबसे प्रतिष्ठित न्यायिक आयोगों में से एक, संविधान के कामकाज की समीक्षा करने के लिए बने राष्ट्रीय आयोग द्वारा भी जनसंख्या विस्फोट को नियंत्रित करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 47A सम्मिलित करने की सिफारिश की गई है।

"कई भारतीयों के पास आधार नहीं"

उच्च न्यायालय में याचिका में दावा किया गया था कि भारत की जनसंख्या में चीन के "आगे" निकल रही है क्योंकि लगभग 20 प्रतिशत भारतीयों के पास आधार नहीं है और इसलिए उनका कोई हिसाब नहीं है। देश में अवैध रूप से करोड़ों रोहिंग्या और बांग्लादेशी भी रह रहे हैं।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि बलात्कार और घरेलू हिंसा जैसे जघन्य अपराधों के पीछे एक उल्लेखनीय कारक होने के अलावा, "जनसंख्या विस्फोट भ्रष्टाचार का भी मूल कारण है।"

उन्होंने प्रदूषण और संसाधनों और नौकरियों की कमी के लिए जनसंख्या विस्फोट को भी जिम्मेदार ठहराया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि जनसंख्या नियंत्रण उपायों के बिना, "स्वच्छ भारत" और " बेटी बचाओ" जैसे अभियान सफल नहीं होंगे।

उन्होंने कहा था कि जब तक सरकार दो करोड़ से अधिक बेघर व्यक्तियों को आवास उपलब्ध नहीं कराती तो ऐसे व्यक्तियों की संख्या बढ़कर 10 करोड़ हो जाएगी।

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