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सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल मर्डर केस में मौत की सजा को कम किया

LiveLaw News Network
14 Dec 2021 5:08 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल मर्डर केस में मौत की सजा को कम किया
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सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल मर्डर के दोषी व्यक्ति को दी गई मौत की सजा को कम दिया है।

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति बी.आर. गवई भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 201 और 506 बी के तहत दंडनीय अपराधों के लिए ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित मौत की सजा की पुष्टि करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दोषी द्वारा दायर एक अपील पर विचार कर रहे थे।

पीठ ने मौत की सजा को कम करके 30 साल के कठोर कारावास में परिवर्तित करते हुए कहा,

"चूंकि अपीलकर्ता ग्रामीण और आर्थिक रूप से पिछड़ी पृष्ठभूमि से आता है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, उसे कठोर अपराधी नहीं कहा जा सकता है और यह उसका पहला अपराध है। इसके अलावा, जेल अधीक्षक द्वारा जारी प्रमाण पत्र से पता चलता है कि जेल में अपीलकर्ता का आचरण संतोषजनक रहा है इसलिए अपीलकर्ता के सुधार और पुनर्वास की संभावना है और इस प्रकार हम मौत की सजा को 30 साल के कठोर कारावास में बदलने के इच्छुक हैं।"

कोर्ट ने बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य और मच्छी सिंह एंड अन्य बनाम पंजाब राज्य सहित कई फैसलों पर भरोसा किया।

इसमें कहा गया है,

"यह तय करने में कि क्या कोई मामला दुर्लभ से दुर्लभतम की श्रेणी में आता है, अपराध की क्रूरता और/या भीषण और/या जघन्य प्रकृति ही एकमात्र मानदंड नहीं है। न्यायालय को अपरीधी की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना चाहिए। मौत की सजा एक अपवाद है और आजीवन कारावास नियम है।"

अभियोजन पक्ष के वकील ने ओकुलर सबूतों के आधार पर मामले की दलील दी और स्वीकार किया कि गवाह की गवाही मामूली विसंगतियों से पीड़ित थी।

अदालत ने इस पर कहा कि अवलोकन की सामान्य त्रुटियों, स्मृति की सामान्य त्रुटियों (समय बीतने के कारण, मानसिक स्थिति, घटना के समय सदमा और भय) के कारण हमेशा सामान्य विसंगतियां होती हैं।

अपीलकर्ता के वकील ने दो प्राथमिक तर्क दिए; एक साक्ष्यों में कुछ विसंगतियों के बारे में, जिस पर अपीलकर्ता के वकील ने मांग की कि उनके मामले को अलग रखा जाए और दूसरा अपीलकर्ता को पहली बार अपराधी मानते हुए मौत की सजा की गैर-आवश्यकता के बारे में।

पीठ ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए मौत की सजा को कम करने के अलावा मामूली विसंगतियों के आधार पर गवाहों की गवाही को अलग रखने के सवाल पर गौर किया और उत्तर प्रदेश राज्य बनाम कृष्णा मास्टर एंड अन्य के ऐतिहासिक फैसले को संदर्भित किया।

इसमें कहा गया है,

"पुलिस के सामने गवाहों द्वारा दिए गए बयान संक्षिप्त बयान के लिए हैं और अदालत में साक्ष्य की जगह नहीं ले सकते हैं। छोटी चूक अदालत द्वारा इस निष्कर्ष को उचित नहीं ठहराएगी कि संबंधित गवाह झूठे हैं। विसंगतियों से अभियोजन पक्ष के साक्ष्य को नुकसान हो सकता है, लेकिन इन विसंगतियों से कोई आपराधिक मामला मुक्त नहीं है।"

पीठ ने माना कि गवाहों की ओकुलर गवाही ने इस मामले में किसी भी उचित संदेह से परे आरोपी के अपराध को स्थापित किया। इसके ही साथ यह भी नोट किया कि मामला मौत की सजा का वारंट नहीं करता है, क्योंकि "ट्रायल कोर्ट के फैसले से, यह ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि अपीलकर्ता को सजा के प्रश्न पर सार्थक समय और सुनवाई का एक वास्तविक अवसर दिया गया था। निचली अदालत और उच्च न्यायालय ने केवल अपराध को ध्यान में रखा है, लेकिन अपराधी की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, उसकी मनःस्थिति और उसके विचार पर विचार नहीं किया गया।

अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया और अपीलकर्ता को 30 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।

दोषी की ओर से सीनियर एडवोकेट एन हरिहरन पेश हुए।

प्रतिवादी राज्य की ओर से सहायक महाधिवक्ता स्वरूपमा चतुर्वेदी पेश हुईं।

केस का शीर्षक: भागचंद्र बनाम मध्य प्रदेश राज्य

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