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आरोपी द्वारा जमानत शर्त के तौर पर जमा की गई राशि पीड़ित निकाल सकता है? सुप्रीम कोर्ट करेगा परीक्षण

LiveLaw News Network
5 Sep 2019 2:20 PM GMT
आरोपी द्वारा जमानत शर्त के तौर पर जमा की गई राशि पीड़ित निकाल सकता है? सुप्रीम कोर्ट करेगा परीक्षण
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सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर एक याचिका पर नोटिस जारी किया है जिसमें अपराध के एक पीड़ित की प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया गया था कि उसे आरोपी द्वारा अग्रिम जमानत के लिए बतौर शर्त जमा की गई रकम को निकालने की इजाजत दी जाए। जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​और जस्टिस सुभाष रेड्डी की पीठ ने 2 सितंबर को ये नोटिस जारी किया।

ये याचिका मुंबई के एक स्त्री रोग विशेषज्ञ अमूल नवनीतलाल रावल द्वारा दायर धोखाधड़ी के एक मामले से उत्पन्न हुई है जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्हें एक बिल्डर ने झूठे वादे कर धोखा दिया था। रावल ने आरोप लगाया कि बिल्डर ने अपार्टमेंट के निर्माण के लिए उसके द्वारा जमा किए गए कई लाख रुपये में से 10,83,000 रुपये की राशि निकाल ली थी।

रावल की शिकायत के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 406 और 420 के तहत धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के अपराध के लिए 2016 में FIR दर्ज की गई थी।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने आपराधिक मामले में आरोपी को अग्रिम जमानत दी थी और शर्त लगाई थी कि वह एक राष्ट्रीयकृत बैंक में 10,83,000 रुपये की राशि जमा करे। आरोपी के वकील द्वारा अदालत के समक्ष स्वीकार किए जाने के बाद ये निर्देश दिए गए कि उसने यह राशि निकाल ली थी। आरोपी ने राशि जमा की और गिरफ्तारी से पहले ही जमानत ले ली।

इस पृष्ठभूमि में शिकायतकर्ता रावल ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत एक आवेदन दायर किया जिसमें आरोपी द्वारा जमा की गई राशि को वापस लेने की मांग की गई। रावल ने कहा कि यह राशि कानूनी तौर पर उसकी है और वह अपराध का शिकार होने के कारण उसका हकदार है। उन्होंने यह भी बताया कि वह एक वरिष्ठ नागरिक हैं और मामले की सुनवाई पूरी होने में वर्षों लग सकते हैं।

याचिका में कहा गया कि अगर पुलिस ने आरोपी के खाते को धारा 102 सीआरपीसी के तहत जब्त कर लिया है तो पीड़ित सुप्रीम कोर्ट के 2018 में तीस्ता अतुल शीतलवाड़ बनाम गुजरात राज्य के फैसले के मद्देनजर चार्जशीट दाखिल होने के बाद सीआरपीसी की धारा 457 का आह्वान करके रकम वापस मांग सकते हैं।

हालांकि, वह विकल्प किसी अभियुक्त द्वारा स्वेच्छा से जमा की गई राशि के लिए नहीं दिया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह भेदभाव अन्यायपूर्ण है, क्योंकि शिकायतकर्ता को आरोपी द्वारा धोखे से लिए धन को प्राप्त करने के लिए ट्रायल के पूरा होने का इंतजार करना होगा जिसमें कई साल लग सकते हैं।

याचिका में राकेश बबन बरहोड बनाम महाराष्ट्र राज्य ( 2015) 2 SCC 313 में शीर्ष अदालत के फैसले का भी हवाला दिया गया है जहां अदालत ने उस मामले में शिकायतकर्ता को मामले के परिणाम के अधीन आरोपी द्वारा जमानत के लिए शर्त के रूप में जमा की गई राशि को वापस लेने की अनुमति दी थी।

"यह प्रस्तुत किया गया है कि माननीय उच्च न्यायालय यह विचार करने में विफल रहा है कि रजिस्ट्री में जमा की गई राशि याचिकाकर्ता की है और उसे वापस देने से इनकार करना पीड़ित व्यक्ति के साथ अन्याय होगा, जिसे बिल्डर के हाथों धोखा दिया गया है और जो और भी पीड़ित होगा, वकील नीलेश त्रिभुवन द्वारा तैयार और वकील आनंद लांडगे के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है।

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