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उच्च न्यायालय में जमानत अर्जी वापस लेने के बाद आरोपी सत्र न्यायालय में जमानत अर्जी दाखिल कर सकता है, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

LiveLaw News Network
1 Sep 2019 9:19 AM GMT
उच्च न्यायालय में जमानत अर्जी वापस लेने के बाद आरोपी सत्र न्यायालय में जमानत अर्जी दाखिल कर सकता है, सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उच्च न्यायालय के समक्ष दाखिल अपनी जमानत की अर्जी वापस लेने के बाद एक आरोपी सत्र न्यायालय के समक्ष जमानत की अर्जी दाखिल कर सकता है।

पीठ के सामने क्या था मामला :

न्यायमूर्ति एन. वी. रमना और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर विचार कर रही थी जिसमें सत्र न्यायालय द्वारा आरोपी को दी गई जमानत को इस आधार पर निरस्त कर दिया गया कि उसने पहले जमानत के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और ये याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी। बाद में उसने जमानत की अर्जी वापस ले ली।

हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए शरद बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में पीठ ने कहा :

"इस संबंध में यह उल्लेख किया जा सकता है कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 या इस न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून में कोई प्रावधान ऐसा नहीं है कि एक बार किसी अभियुक्त ने उच्च न्यायालय के समक्ष अपनी जमानत की अर्जी वापस ले ली है तो वह बाद में सत्र न्यायालय मे जमानत की अर्जी दाखिल नहीं कर सकता और उसके बाद की जमानत अर्जी केवल उच्च न्यायालय के समक्ष दाखिल होगी। यह कहते हुए पीठ ने आरोपी को दी गई जमानत को बहाल कर दिया।"

मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले में सत्र न्यायालय ने अभियोजन पक्ष द्वारा दी गई दलीलों पर विचार किया कि एक बार पहले जमानत अर्जी को उच्च न्यायालय से बिना शर्त वापस ले लिया गया तो सत्र न्यायालय जमानत अर्जी का संज्ञान नहीं ले सकता है।

अदालत ने कहा था: " यह बहुत चौंकाने वाला है और मेरे लिए यह आश्चर्य की बात है। सख्ती से बोलते हुए मैं इस प्रकार के प्रावधानों या माननीय शीर्ष या उच्च न्यायालय के किसी भी आदेश के अधिकारक्षेत्र में नहीं आता हूं। मेरे विचार में, जब माननीय उच्च न्यायालय ने मेरिट पर सुनवाई करने के बाद जमानत के आवेदन को खारिज किया हो तो उसी आधार पर दूसरी याचिका दाखिल होने योग्य नहीं है, लेकिन यदि पूछताछ या ट्रायल के दौरान बाद की घटनाएं हुईं तो मेरी राय में आवेदन को बाद की घटना या परिस्थितियों में बदलाव के आधार पर आरोपी के अधिकार इंकार नहीं किया जा सकता है। "

सत्र न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए उच्च न्यायालय ने यह कहा था कि सत्र न्यायालय ने न्यायिक अनुशासन को लागू करने बजाए उसे गो- बॉय कह दिया था और उस आवेदन का फैसला किया था जो न्यायिक स्वामित्व के सिद्धांतों पर अप्राप्य था।



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