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एफआईआर नहीं हुई है तो हाईकोर्ट सीआरपीसी की धारा 156(3) के स्तर पर जांच नहीं रोक सकता : पटना हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
16 Sep 2019 3:01 AM GMT
एफआईआर नहीं हुई है तो हाईकोर्ट सीआरपीसी की धारा 156(3) के स्तर पर जांच नहीं रोक सकता : पटना हाईकोर्ट
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मुख्य न्यायाधीश अमरेश्वर प्रताप साही और राजीव रंजन प्रसाद की पटना हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने 23 जुलाई 2018 को हाईकोर्ट की एक अन्य खंडपीठ के एक पूर्व आदेश को वापस ले लिया।

इस मामले में याचिकाकर्ता राहुल कुमार पांडेय ने अपने वक़ील प्रशांत कुमार के माध्यम से एक खंडपीठ के फ़ैसले की समीक्षा और उसे वापस लेने की मांग की थी। यह फ़ैसला पटना हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली खंडपीठ ने दूसरे पक्ष नम्बर 2, शारदा देवी के लिखे एक पत्र का संज्ञान लिया था जिसमें आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता ने फ़र्ज़ी तरीक़े से दस्तावेज़ बनवाया था और एक ज़मीन की जमाबंदी करा लिया था जो उसने ख़रीदी थी।

शारदा देवी ने उसमें यह आरोप भी लगाया था कि याचिकाकर्ता ने उसकी प्रतिष्ठा को नुक़सान पहुंचाने के लिए सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत शिकायत भी दर्ज कराई थी जिसकी वजह से सीजेएम ने उसके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश दिया था।

इस पत्र को जनहित याचिका के रूप में संज्ञान लेते हुए उस खंडपीठ ने ज़िला जज को इस मामले की जांच करने और क़ानून के अनुरूप कार्रवाई करने का निर्देश दिया। इस जांच की परिणती एक निर्देश में हुई जिसमें कहा गया कोई अपराध नहीं हुआ है और याचिकाकर्ता के आवेदन पर एफआईआर दर्ज करने की कोई ज़रूरत नहीं थी।

पीठ ने 23 जुलाई 2018 को दिए गए आदेश को वर्तमान मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने वापस ले लिया और कहा कि जब एफआईआर दर्ज नहीं हुई है तो अदालत इस मामले की जांच को बाधित नहीं कर सकती।

दलील

समीक्षा याचिका दायर करने वाले की दलील थी कि उक्त आदेश में उस डिवीजन बेंच द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया आपराधिक न्यायशास्त्र से अनभिज्ञ थी और यह प्रक्रियागत त्रुटि थी। हुआ यह कि उसे कोई नोटिस दिए बिना ही पारित कर दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि धारा 156 (3) सीआरपीसी के चरण में, मजिस्ट्रेट द्वारा पारित कोई भी आदेश किसी भी व्यक्ति के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालता है और आरोपी को सुनवाई का मौक़ा दिए जाने का अधिकार नहीं है क्योंकि वह संज्ञान-पूर्व का स्तर होता है।

यह भी कहा गया कि वर्तमान मामले में एफआईआर अभी दर्ज भी नहीं हुई थी और यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि खंडपीठ ज़िला जज से मामले की जांच कराने का उस समय आदेश देंगे जब एफआईआर दर्ज भी नहीं हुई है और पुलिस को अभी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को अपनी जांच का रिपोर्ट देना अभी बाक़ी है।

जांच

उपरोक्त दलील से सहमत होते हुए अदालत ने कहा -

"संबंधित आदेश से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ है और याचिकाकर्ता को नोटिस नहीं भेजना प्रक्रियात्मक ग़लती थी। पीठ ने यह भी माना कि धारा 156(3) संज्ञान-पूर्व आदेश है। "एफआईआर दर्ज होने के बाद ही यह उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ मामला खुलता है जिसके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज हुई है, ताकि संविधान की धारा 226 के तहत उसको इसका उपचार हासिल हो। वर्तमान मामले में हम पाते हैं कि इस अदालत की खंडपीठ के पास एफआईआर दायर होने से पहले ही जांच को बाधित करने का कोई कारण नहीं था।"

इस संबंध में अदालत ने सुरेश चांद बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2001) 2 SCC 628 मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला भी दिया। अदालत ने कहा कि खंडपीठ ने ग़लती की है और न्याय के हित में इस आदेश को वापस लेकर इसे दुरुस्त किया जा सकता है। अदालत ने वृहन मुंबई नगर निगम बनाम प्रतिभा इंडस्ट्रीज लिमिटेड (2019) 3 SCC 203 मामले का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट संवैधानिक कोर्ट है इसलिए उसके पास अपने आदेश को वापस लेने का अधिकार है।




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