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क्या अग्रिम जमानत सीमित समय के लिए ही मिल सकती है ? संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा

LiveLaw News Network
24 Oct 2019 4:55 AM GMT
क्या अग्रिम जमानत सीमित समय के लिए ही  मिल सकती है ? संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा
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जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस इंदिरा बनर्जी, जस्टिस विनीत सरन, जस्टिस एम आर शाह और जस्टिस एस रविन्द्र भट की सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने बुधवार को सुशीला अग्रवाल और अन्य बनाम राज्य (दिल्ली NCT) और अन्य के मामले से संबंधित दलीलें सुनीं। ये मामला 15.05.2018 को जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस मोहन एम शांतनगौदर और जस्टिस नवीन सिन्हा की पीठ ने निम्नलिखित प्रश्नों पर एक बड़ी बेंच द्वारा विचार के लिए भेजा :

1. क्या सीआरपीसी की धारा 438 के तहत किसी व्यक्ति को दिया गया सरंक्षण एक निश्चित अवधि तक सीमित होना चाहिए ताकि वह व्यक्ति ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण कर सके और नियमित जमानत ले सके?

2. क्या आरोपी को न्यायालय द्वारा बुलाने पर अग्रिम जमानत का समय और अवस्था समाप्त हो जानी चाहिए?

इस सुनवाई में कानून के इन सवालों पर संविधान पीठ ने विचार किया। गुरबख्श सिंह सिब्बिया और अन्य बनाम पंजाब राज्य, सिद्धराम सतलिंगप्पा म्हात्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य के मामलों में फैसला था कि अग्रिम जमानत सीमित अवधि के लिए नहीं होनी चाहिए जबकि सलाउद्दीन अब्दुलसमद शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य जैसे मामले अग्रिम जमानत की सीमित अवधि के लिए कहते हैं।

उपरोक्त मुद्दों को ध्यान में रखते हुए, वरिष्ठ वकील हरिन पी रावल ने शुरू में जमानत रद्द करने के मुद्दों का जिक्र करते हुए तर्कों की शुरुआत की। रावल ने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा दी गई जमानत को ट्रायल कोर्ट द्वारा रद्द नहीं किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे सभी मामलों में, अग्रिम जमानत रद्द करने का मामला उन्हीं जजों के सामने जाना चाहिए जिन्होंने पहले जमानत दी थी। औचित्य ये ही है कि वही अदालत इसे फिर से सुने। जिन मामलों में उच्च न्यायालय ने जमानत दी है, उन मामलों में नए साक्ष्य के आधार पर जमानत रद्द करना कठिन है।

रावल ने तीन परिस्थितियां भी प्रस्तुत की जिनमें जमानत रद्द की जानी चाहिए:

1. जब अभियुक्त शर्तों का पालन नहीं करता है;

2. जब नई सामग्री रिकॉर्ड पर आती है;

3. जब जमानत देना ही गलत था।

सिब्बिया मामले का फैसला कहता है कि सीमा अदालत के विवेक का विषय हैं। वहीं वरिष्ठ वकील के वी विश्वनाथन ने ये दलील दी कि गिरफ्तारी-पूर्व जमानत अग्रिम जमानत से अलग नहीं है। उनके अनुसार, अग्रिम जमानत का विचार झूठी गिरफ्तारी से बचना है। सिब्बिया मामला अग्रिम जमानत की अस्वीकृति था। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना चाहिए कि जमानत रद्द कर दी जानी चाहिए।

इन तर्कों का मुकाबला करते हुए एएसजी विक्रमजीत बनर्जी ने प्रस्तुत किया कि यदि अग्रिम जमानत मुकदमे के अंत तक चलती है, तो सीआरपीसी की धारा 209 और 240 जैसे कुछ प्रावधानों के लिए जिनमें अभियुक्तों की उपस्थिति की आवश्यकता होती है वो प्रभावहीन हो जाएंगे। हालांकि, इन प्रावधानों को पढ़ने पर इस तर्क को न्यायालय ने खारिज कर दिया।

"जमानत क्षेत्र अनिवार्य रूप से एक विवेकाधीन क्षेत्राधिकार है"

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तब कहा कि केवल एक ही सवाल पर विचार किया जाना है जो समय के प्रतिबंध के संबंध में है, जमानत विवेकाधीन है - "जमानत क्षेत्र अनिवार्य रूप से एक विवेकाधीन क्षेत्राधिकार है।" जमानत देने के लिए समय सीमा तय करना न्यायालय के विवेक पर निर्भर है; एक निर्णय या एक क़ानून समान नहीं हो सकता। यदि समय अवधि समाप्त हो जाती है तो अभियुक्त अभी भी सीआरपीसी की धारा 438 के तहत जमानत के लिए आवेदन करने का अधिकार रखता है। उन्होंने कहा कि सिब्बिया मामला अच्छा कानून था क्योंकि इसने "जरूरी नहीं" शब्द के उपयोग द्वारा न्यायालय के विवेक पर समय सीमा रखने के मुद्दे को छोड़ दिया।

इसके अतिरिक्त एएसजी अमन लेखी ने कहा कि जमानत की अवधि सीमित नहीं होनी चाहिए। धारा 438 को अग्रिम जमानत के संदर्भ में स्थापित किया गया है ; यह गिरफ्तारी के दुरुपयोग के अवसर का मुकाबला करने के लिए लाया गया था। उन्होंने के वी विश्वनाथन की दलीलों से सहमति जताई और कहा कि जो शर्तें लगाई जाएं वो केवल जांच की सहायता से ही हो सकती हैं। इसलिए यदि किसी सीमा को निर्धारित किया जाना है तो यह तभी स्वीकार्य होगा जब यह जांच की सहायता के लिए आवश्यक हो।

इन तर्कों के निष्कर्ष पर बेंच ने वरिष्ठ वकीलों की ओर से लिखित प्रस्तुतियां मांगी और मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया।

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