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बच्चों के खिलाफ यौन अपराध : बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा, दोषी को कठोर सजा दी जानी चाहिए

LiveLaw News Network
26 Dec 2019 3:45 AM GMT
बच्चों के खिलाफ यौन अपराध :  बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा, दोषी को कठोर सजा दी जानी चाहिए
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने पिछले शुक्रवार को सागर धुरी नामक युवक द्वारा दायर एक अपील को खारिज कर दिया। इस 23 वर्षीय युवक को एक साढ़े पांच साल की बच्ची का यौन उत्पीड़न करने का दोषी पाया गया था और दस साल की सजा सुनाई गई थी।

न्यायमूर्ति पृथ्वीराज के चव्हाण ने निष्कर्ष निकाला कि अपील योग्यता से रहित है और कहा कि-

''यह एक ऐसा मामला है जिसमें अपीलकर्ता में सुधार का कोई सवाल ही नहीं है, क्योंकि वह इतना वयस्क व्यक्ति हो चुका था जो अपने कृत्य के परिणामों को जानता था।''

सागर को पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) की धारा 6, आईपीसी की धारा 342 के तहत दोषी ठहराया गया था और पॉक्सो अधिनियम की धारा 33 (8) के अनुसार पीड़ित को 25,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। आरोपी को आईपीसी की धारा 376, 366 (ए) के तहत बरी कर दिया गया था।

क्या था मामला

पीड़िता बच्ची मुंबई के पवई के एक चॉल की रहने वाली थी। 18 अप्रैल 2015 को वह अपने पड़ोस में बाबू नाम के एक छोटे लड़के के साथ खेलने गई थी। पड़ोसियों में से एक गवाह (PW6)ने एक अन्य पड़ोसी (PW3) से कहा, जो पीड़ित का परिवार की रिश्तेदार है कि वह जाकर देखकर आए कि सागर क्या कर रहा है। PW3 अपीलकर्ता की चाची (श्रीमती सावंत) के घर के पीछे की तरफ गई और दरवाजे में एक जगह के माध्यम से घर में झांका, तो उसे झटका लगा, उसने देखा कि पीड़िता पेट के बल जमीन पर लेटी हुई थी जबकि अपीलकर्ता उसके ऊपर लेटा हुआ था। उसे कुछ गलत होने का अंदेशा हुआ। इस कारण उसने सामने का दरवाजा खटखटाया और पीड़िता का नाम पुकार कर शोर मचाया। पीड़िता पांच मिनट बाद बाहर आई।

PW3 उसे अपने घर ले गई और पूछा कि अपीलकर्ता क्या कर रहा था। पीडिता ने PW3 को बताया कि वह खेलने के लिए बाबू की तलाश में गई थी। उसने आगे बताया कि अपीलकर्ता ने उसे बहाने से बुलाया कि वह उसको अपने मोबाइल पर गाने दिखाएगा। अपीलकर्ता उसे घर में ले गया, अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। फिर उसके कपड़ों को नीचे खींचा और उसे जमीन पर पेट के बल लेटा दिया। पीड़िता ने बताया कि सागर ने उसके साथ गुदा मैथुन किया। इसके बाद एफआईआर दर्ज की गई और अपीलकर्ता को गिरफ्तार कर लिया गया। पीड़िता की जांच डॉक्टर मीना सावजानी ने की। 30 जून, 2018 के एक फैसले में, विशेष पॉक्सो कोर्ट ने अपीलकर्ता को दोषी ठहराया था।

हाईकोर्ट का फैसला

अपीलकर्ता के वकील अनिकेत वागल ने दलील दी कि इस बात का कोई मेडिकल सबूत नहीं है जो यह दर्शाता हो कि अपीलकर्ता द्वारा पीड़िता का यौन उत्पीड़न या छेड़छाड़ की गई थी। उसने कहा कि पीड़िता की मां के सबूत सुनी हुई बातों पर हैं और स्वीकार योग्य नहीं हैं।

वागल ने फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी रिपोर्ट का हवाला दिया और कहा कि इस रिपोर्ट से पता चलता है कि पीड़िता के गुदा स्वैब में कोई पुरुष डीएनए नहीं पाया गया था।

दूसरी ओर, एपीपी एस.वी गावंद ने अपीकर्ता के वकील की दलीलों का पुरजोर विरोध किया और दलील दी कि विशेष न्यायाधीश ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के साक्ष्य की सही सराहना की है और मेडिकल साक्ष्य को संदर्भित करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि अपीलकर्ता को तब रोक दिया गया था जब वह पीड़ित को पेनिट्रैट करने वाला था। एपीपी ने दलील दी कि पूरे मामले को देखते हुए वह पॉक्सो अधिनियम की धारा 3 के तहत दिए गए अपराध को करने ही वाला था।

मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा दर्ज पीड़ित लड़की के बयान और अन्य गवाहों की गवाही का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि-

''दिलचस्प बात यह है कि दो बचाव गवाहों की जांच के बावजूद, अपीलकर्ता पीडब्लू 2 (पीड़िता), पीडब्लू 3 और पीडब्लू 6 की गवाही में कोई सेंध लगाने में सफल नहीं हुआ है। न ही यह साबित कर पाया कि उसे इस मामले में झूठा फंसाया गया है, क्योंकि काफी समय पहले उसका झगड़ा हुआ था।''

न्यायमूर्ति चव्हाण ने कहा कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 18 में अपराध करने के प्रयास के लिए सजा का प्रावधान है। पीठ ने कहा कि-

''जैसा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों और तथ्यों की पूर्वोक्त चर्चा से देखा जा सकता है, पीड़िता ने अपीलकर्ता को दादा के रूप में बुलाया, जिसका अर्थ है, उसे एक बड़े भाई की तरह अपीलकर्ता के प्रति पूर्ण विश्वास और सम्मान था।

अपीलकर्ता ने उसके साथ यौन शोषण करके उससे विश्वासघात किया। उपर्युक्त चर्चा से यह भी स्पष्ट होता है कि अपीलकर्ता पीडब्लू 2 पर उत्तेजित यौन हमला करने वाला था, लेकिन पीडब्लू 3-एम के हस्तक्षेप के कारण वह अपने नापाक मंसूबे में सफल नहीं हो सका, इसलिए, वास्तव में वह अपनी गतिविधि या अपराध को पूरा कर सकता था क्योंकि वह पहले से ही पीडब्लू 2-जी के पीछे के हिस्से पर अपने लिंग की मूवमेंट शुरू कर चुका था।''

तत्पश्चात न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा मदन गोपाल बनाम नवल दुबे, एआईआर 1992 एससीडब्ल्यू, 1480 में दिए फैसले का हवाला दिया। जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि-

''हालांकि नाबालिग बच्चियों पर होने वाले सभी यौन हमलों की रिपोर्ट नहीं की जाती है और सारे मामले सामने नहीं आते हैं। उसके बावजूद भी बच्चों पर होने वाले यौन अपराधों में चिंताजनक और चौंकाने वाली वृद्धि हुई है।

इसके पीछे कारण यह हैं कि बच्चे बलात्कार के कृत्य से अनभिज्ञ होते हैं और प्रतिरोध या बचाव करने में सक्षम नहीं होते हैं और उन मादक जानवरों के लिए आसान शिकार बन जाते हैं जो बच्चियों और युवा लड़कियों को बहलाने के लिए बेईमान, धोखेबाज और कपटी कला का प्रदर्शन करते हैं, इसलिए ऐसे अपराधी जो सभ्य समाज के लिए खतरा हैं, उन्हें निर्दयतापूर्वक या बेरहम और कठोर या अनवरत तरीको से दंडित किया जाना चाहिए।''

इस प्रकार अपील को खारिज करते हुए, कोर्ट ने कहा-

''स्पष्ट है कि इस तरह के अपराधों से किस तरह निपटना आवश्यक है जो सभ्य समाज के लिए खतरा है और इसलिए दोषियों को कठोर रूप से दंडित किया जाना चाहिए।''


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