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सुप्रीम कोर्ट में SC/ST एक्ट पुनर्विचार याचिका पर आ सकता है 3 अक्टूबर से पहले फैसला

LiveLaw News Network
25 Sep 2019 7:43 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट में  SC/ST एक्ट पुनर्विचार याचिका पर आ सकता है 3 अक्टूबर से पहले फैसला
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SC/ST एक्ट के प्रावधानों को हलका करने के 20 मार्च, 2018 के फैसले पर केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 3 अक्टूबर से पहले अपना फैसला सुना सकता है। बुधवार को जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह कहा कि पहले वो केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर फैसला सुनाएंगे इसके बाद वे 3 अक्टूबर को फैसले के बाद लाए गए संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेंगे। इससे पहले 18 सितंबर को 3 जजों की पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों पर सरकार को पीठ ने लगाई थी कड़ी फटकार

जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस एम. आर. शाह और जस्टिस बी. आर. गवई की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान मानवीय तरीके से सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों पर सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी। जस्टिस मिश्रा ने अटार्नी जनरल के. के. वेणुगोपालन को कहा था कि सीवर सफाई में रोजाना लोगों की जान जा रही है। इन लोगों को मास्क और ऑक्सीजन सिलेंडर तक नहीं दिए जाते। सरकार क्या कर रही है?

इससे पहले 13 सितंबर को 2 जजों की पीठ ने बड़ी बेंच के गठन के लिए मामले को CJI रंजन गोगोई के पास भेज दिया था। दरअसल देश में कानून जाति तटस्थ और एकसमान होने चाहिए, ये कहते हुए 1 मई को सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। पीठ ने कहा था कि देश में कानून एकसमान होना चाहिए और ये सामान्य वर्ग या एससी/एसटी वर्ग के लिए नहीं हो सकता।

पीठ ने रखा था फैसला सुरक्षित

पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल की दलीलों को सुनने के बाद मामले में फैसला सुरक्षित रखा था। शुरुआत में वेणुगोपाल ने कहा था कि मार्च का फैसला "समस्याग्रस्त" था और अदालत द्वारा इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। पिछले साल फैसले का समर्थन करने वाले पक्षकारों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने कहा था कि केंद्र की पुनर्विचार याचिका के कोई मायने नहीं रह गए हैं क्योंकि संसद पहले ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2018 को पारित कर चुकी है ताकि फैसले के प्रभावों को बेअसर किया जा सके।

उन्होंने कहा था कि संशोधन अधिनियम पर तब तक रोक लगाई जानी चाहिए जब तक अदालत केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर अपना फैसला नहीं दे देती है। पीठ ने कहा कि अगर फैसले में कुछ गलत किया गया है तो उसे हमेशा पुनर्विचार याचिका में सुधारा जा सकता है।

वहीं वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने फैसले का समर्थन करने वाले एक पक्षकार की ओर से कहा था कि फैसले में दिया गया तत्काल गिरफ्तारी से सरंक्षण, संविधान की भावना के खिलाफ नहीं है। इसका हर पहलू कानून के अनुसार है। दरअसल शीर्ष अदालत ने 30 जनवरी को एससी/एसटी एक्ट में संशोधन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था।

संसद ने एक विधेयक किया था पारित

SC और ST कानून के तहत गिरफ्तारी के खिलाफ कुछ सुरक्षा उपायों से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए पिछले साल 9 अगस्त को संसद ने एक विधेयक पारित किया था। शीर्ष अदालत ने 20 मार्च, 2018 को सरकारी कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों के खिलाफ कड़े SC/ST अधिनियम के बड़े पैमाने पर दुरुपयोग पर ध्यान दिया था और कहा था कि कानून के तहत दायर किसी भी शिकायत पर तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी।

पीठ ने यह भी कहा था कि "कई मौकों" पर, निर्दोष नागरिकों को आरोपी और लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों को निभाने से रोका जा रहा है, जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को लागू करते समय विधायिका का ऐसा इरादा कभी नहीं था।

अदालत ने कहा था कि अत्याचार अधिनियम के तहत मामलों में अग्रिम जमानत देने के खिलाफ कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, अगर कोई भी प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता या जहां शिकायतकर्ता को प्रथम दृष्टया दोषी पाया जाता है। पीठ ने कहा था कि अत्याचार अधिनियम के तहत मामलों में गिरफ्तारी के कानून के दुरुपयोग के मद्देनजर किसी लोक सेवक की गिरफ्तारी केवल नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा अनुमोदन के बाद और एक गैर-लोक सेवक की गिरफ्तारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के अनुमोदन के बाद ही हो सकती है। गौरतलब है कि संसद द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए लाए गए संशोधन को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

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