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हिरासत में टॉर्चर पर केंद्र को कानून बनाने की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज

LiveLaw News Network
6 Sep 2019 5:19 AM GMT
हिरासत में टॉर्चर पर केंद्र को कानून बनाने की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज
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सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ वकील डॉ अश्विनी कुमार की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें केंद्र सरकार को हिरासत में टॉर्चर के खिलाफ एक व्यापक कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

इससे पहले वरिष्ठ वकील ने संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाए गए 'कन्वेंशन फॉर टॉर्चर एंड अदर क्रूएल, इनह्युमन ओर डीग्रेडिंग ट्रीटमेंट ओर पनिशमेंट 'के आधार पर एक प्रभावी और उद्देश्यपूर्ण विधायी ढांचा/ कानून के लिए दिशा-निर्देश मांगने के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था।इसका महासभा द्वारा 10 दिसंबर 1984 को हस्ताक्षर, अनुसमर्थन और परिग्रहण किया गया था।

उक्त रिट याचिका को अटॉर्नी जनरल द्वारा पेश दलीलों के आधार पर खारिज किया गया कि ये विधि आयोग में चर्चा का विषय है और विधि आयोग पहले ही कुछ सिफारिशें कर चुका है और इस रिपोर्ट पर सरकार द्वारा गंभीरता से विचार किया जा रहा है।

दरअसल पूर्व कानून मंत्री ने शीर्ष अदालत के समक्ष आवेदन दायर किया था कि रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने विभिन्न निर्णयों का हवाला दिया और कहा:

यह एक विशेष तरीके से कानून बनाने के लिए विधायिका को निर्देश जारी करने की न्यायिक समीक्षा की शक्ति के बाहर है, क्योंकि संविधान अदालतों को नीति के मामलों में कार्यपालिका को निर्देश देने और सलाह देने की अनुमति नहीं देता है।

संसद, विधायिका के रूप में, कोई कानून बनाने के लिए इस शक्ति का उपयोग करती है और कोई भी बाहरी प्राधिकरण कानून का विशेष भाग जारी नहीं कर सकता। यह केवल असाधारण मामलों में होता है जहां एक निर्वात और गैर-मौजूदा स्थिति हो तब न्यायपालिका, अपनी संवैधानिक शक्ति के अभ्यास में, कदम उठाती है और तब तक एक समाधान प्रदान करती है जब तक कि विधायिका अपनी भूमिका निभाने के लिए आगे नहीं आती।

अदालत ने, हालांकि, नांबी नारायण के मामले सहित हाल के मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि, वह उचित मामले में और इससे पहले की दलीलों और तथ्यात्मक तथ्यों के आधार पर, उचित दिशा-निर्देश / निर्देश जारी करने, जोड़ने और निर्देशों में सुधार करने के लिए आदेश जारी कर सकती है और वो भी तब, जब डीके बसु केस और अन्य मामलों में जो शर्तें दी गई हैं, उन्हें संतुष्ट किया जाए।



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