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सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट को हल्का करने पर पुनर्विचार याचिका को अनुमति दी

LiveLaw News Network
1 Oct 2019 9:26 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट को हल्का करने पर पुनर्विचार याचिका को अनुमति दी
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SC/ST एक्ट के प्रावधानों को हलका करने के 20 मार्च, 2018 के फैसले को केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर 3 जजों की पीठ ने वापस ले लिया है।

जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस एम. आर. शाह और जस्टिस बी. आर. गवई की पीठ ने मंगलवार को केंद्र की याचिका को अनुमति देते हुए यह कहा कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों को कानून के खिलाफ निर्देश पारित करने के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता।

"पीठ को तय नहीं करने चाहिए थे दिशा निर्देश; अधिनियम की सुरक्षात्मक प्रकृति थी आवश्यक"

अदालत ने कहा कि 2 जजों की बेंच को दिशा-निर्देश तैयार नहीं करने चाहिए थे, क्योंकि ऐसा करना विधायिका के दायरे में है। आगे यह कहा गया था कि हाशिए के समुदायों के लोगों को प्रताड़ना के अधीन किया जा रहा है, जिसके मद्देनजर अधिनियम की सुरक्षात्मक प्रकृति आवश्यक थी।

पीठ ने आगे ये भी कहा कि अधिनियम के प्रावधानों के दुरुपयोग के एकाध उदाहरणों के तहत अदालत द्वारा इसे कमजोर करने के निर्देश सही नहीं ठहराए जा सकते हैं। दरअसल 18 सितंबर को जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस एम. आर. शाह और जस्टिस बी. आर. गवई की पीठ ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था।

सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों पर सरकार को पीठ ने लगाई थी कड़ी फटकार

पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान मानवीय तरीके से सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों पर सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी। जस्टिस मिश्रा ने अटार्नी जनरल के. के. वेणुगोपालन को कहा था कि सीवर सफाई में रोजाना लोगों की जान जा रही है। इन लोगों को मास्क और ऑक्सीजन सिलेंडर तक नहीं दिए जाते। सरकार क्या कर रही है?

उन्होंने कहा था, "ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के 70 साल बाद भी जातिगत भेदभाव को दूर करने का प्रयास नहीं किया गया है। इस तरह लोगों को मरने नहीं दिया जा सकता है।" पीठ ने अटॉर्नी जनरल को इस संबंध में उठाए जाने वाले कदमों व उपायों पर एक नोट दाखिल करने को कहा था।

अटॉर्नी जनरल का उत्तर

वहीं अटॉर्नी जनरल ने इसपर कहा था कि वो जानते हैं कि सीवर सफाई में कैसे लोगों की जान जा रही है। वहीं याचिकाकर्ता की ओर ये गोपाल शंकरनारायण ने पीठ को बताया था कि हर साल सीवर सफाई के दौरान करीब 300 लोगों की मौत हो जाती है।

इससे पहले 13 सितंबर को 2 जजों की पीठ ने बड़ी बेंच के गठन के लिए मामले को CJI रंजन गोगोई के पास भेज दिया था। अपना फैसला सुनाते हुए जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस यू. यू. ललित की पीठ ने कहा था, "यह मामला महत्वपूर्ण है और इसे देखते हुए हम लगता है कि इसकी सुनवाई 3 जजों की पीठ को करनी चाहिए। इसे अगले सप्ताह सुनवाई के लिए लगाया जाए।"

पीठ ने रखा था फैसला सुरक्षित

पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल की दलीलों को सुनने के बाद मामले में फैसला सुरक्षित रखा था। शुरुआत में वेणुगोपाल ने कहा था कि मार्च का फैसला "समस्याग्रस्त" था और अदालत द्वारा इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। पिछले साल फैसले का समर्थन करने वाले पक्षकारों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने कहा था कि केंद्र की पुनर्विचार याचिका के कोई मायने नहीं रह गए हैं क्योंकि संसद पहले ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2018 को पारित कर चुकी है ताकि फैसले के प्रभावों को बेअसर किया जा सके।

उन्होंने कहा था कि संशोधन अधिनियम पर तब तक रोक लगाई जानी चाहिए जब तक अदालत केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर अपना फैसला नहीं दे देती है। पीठ ने कहा कि अगर फैसले में कुछ गलत किया गया है तो उसे हमेशा पुनर्विचार याचिका में सुधारा जा सकता है।

वहीं वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने फैसले का समर्थन करने वाले एक पक्षकार की ओर से कहा था कि फैसले में दिया गया तत्काल गिरफ्तारी से सरंक्षण, संविधान की भावना के खिलाफ नहीं है। इसका हर पहलू कानून के अनुसार है। दरअसल शीर्ष अदालत ने 30 जनवरी को एससी/एसटी एक्ट में संशोधन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था।

संसद ने एक विधेयक किया था पारित

SC और ST कानून के तहत गिरफ्तारी के खिलाफ कुछ सुरक्षा उपायों से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए पिछले साल 9 अगस्त को संसद ने एक विधेयक पारित किया था। शीर्ष अदालत ने 20 मार्च, 2018 को सरकारी कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों के खिलाफ कड़े SC/ST अधिनियम के बड़े पैमाने पर दुरुपयोग पर ध्यान दिया था और कहा था कि कानून के तहत दायर किसी भी शिकायत पर तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी।

पीठ ने यह भी कहा था कि "कई मौकों" पर, निर्दोष नागरिकों को आरोपी और लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों को निभाने से रोका जा रहा है, जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को लागू करते समय विधायिका का ऐसा इरादा कभी नहीं था।"

अदालत ने कहा था कि अत्याचार अधिनियम के तहत मामलों में अग्रिम जमानत देने के खिलाफ कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, अगर कोई भी प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता या जहां शिकायतकर्ता को प्रथम दृष्टया दोषी पाया जाता है। पीठ ने कहा था कि अत्याचार अधिनियम के तहत मामलों में गिरफ्तारी के कानून के दुरुपयोग के मद्देनजर किसी लोक सेवक की गिरफ्तारी केवल नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा अनुमोदन के बाद और एक गैर-लोक सेवक की गिरफ्तारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के अनुमोदन के बाद ही हो सकती है।



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