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गर्भपात के अधिकार संतुलित होने चाहिए, गर्भवती महिला को गर्भ गिराने का पूर्ण अधिकार नहीं, सुप्रीम कोर्ट में सरकार की दलील

LiveLaw News Network
19 Sep 2019 8:26 AM GMT
गर्भपात के अधिकार संतुलित होने चाहिए, गर्भवती महिला को गर्भ गिराने का पूर्ण अधिकार नहीं, सुप्रीम कोर्ट में सरकार की दलील
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एक याचिका पर जवाब देते हुए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि गर्भवती महिला को अपना गर्भ गिराने का पूर्ण अधिकार नहीं है। इस याचिका मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम, 1971 में गर्भपात के बारे में दिए कुछ मौजूदा प्रावधानों को उदार बनाने की मांग की गई है।

वर्ष 2009 में डॉक्टर निखिल दातार द्वारा दायर याचिका में एमटीपी अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती दी गई थी और गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए बनाई गई 20 सप्ताह की वर्तमान अवधि को बढ़ाकर 26 सप्ताह की करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने कानून में संशोधन की मांग की, ताकि 20 सप्ताह की अवधि के बाद भी एक महिला गर्भपात करा सके।

याचिका में कहा गया है कि बच्चे का विकृति या असामान्यता के साथ पैदा होने वाला जोखिम भी गर्भपात के लिए एक आधार होना चाहिए।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के माध्यम से केंद्र सरकार ने 11 सितंबर को इस याचिका पर अपना जवाब दाखिल किया, जिसमें यह कहा गया था "गर्भवती महिला को अपना गर्भपात कराने का करने का पूर्ण अधिकार नहीं है और गर्भपात का अधिकार, मां और भ्रूण/अजन्मे बच्चे के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जरूरी राज्य हित के साथ संतुलित होना चाहिए।"

सरकार ने यह भी बताया किया कि उन्होंने असुरक्षित गर्भपात के कारण होने वाली मृत्यु दर को कम करने का प्रयास किया है। सरकार की तरफ से यह भी कहा गया कि ''गर्भावस्था से संबंधित कारणों से मृत्यु दर और रुग्णता या रोगों की संख्या को कम करना सरकार की महत्वपूर्ण प्राथमिकता है।''

केंद्र ने अदालत से इस याचिका को असामयिक कहते हुए खारिज करने का आग्रह किया है। केंद्र सरकार ने दलील दी है कि प्रस्तावित संशोधनों के माध्यम से उन महिलाओं के लिए कानूनी पहुंच प्राप्त करना आसान हो जाएगा,जो गर्भावस्था को समाप्त करवाना चाहती हैं।

''गर्भपात सेवाओं तक पहुंच को मजबूत करने और विस्तारित करने के उद्देश्य से'' मंत्रालय ने एमटीपी अधिनियम के प्रावधानों की जांच की है और विभिन्न विशेषज्ञों के परामर्श के बाद वर्ष 2014 में संशोधित विधेयक प्रस्तावित किया गया था।

सरकार ने कहा महिलाओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को और मजबूत करने के लिए विधेयक को वर्ष 2019 में फिर से तैयार किया गया है और कानून मंत्रालय के साथ परामर्श और पुनरीक्षण करने के बाद इसे अंतिम रूप दिया जाएगा।

जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ के समक्ष यह मामला सुनवाई के लिए आया था। पीठ ने इस मामले में गर्भावस्था की समाप्ति के लिए वर्तमान तय अवधि को बढ़ाने के मुद्दे पर कानून बनाने की ओर झुकाव नहीं दर्शाया है, परंतु इसी मामले के बारे में दिशानिर्देश जारी करने का संकेत दिया है। अब इस मामले में 24 सितंबर को अगली सुनवाई होगी।

जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया था, जिसमें एमटीपी अधिनियम के प्रावधानों को उस हद तक चुनौती दी गई थी ,जहां तक यह प्रावधान किसी महिला के गर्भपात के अधिकार को प्रतिबंधित करते हैं। उस याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रावधानों में केवल विवाहित महिलाओं के लिए गर्भपात की अनुमति है, जिसके परिणामस्वरूप एकल माताओं के साथ भेदभाव होता है।


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