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आरक्षित सीट : चुनाव की तारीख के 12 महीने में जाति वैधता प्रमाण पत्र दाखिल करें प्रत्याशी, वरना पूर्वव्यापी बर्खास्तगी होगी : बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
21 Oct 2019 9:17 AM GMT
आरक्षित सीट : चुनाव की तारीख के 12 महीने में जाति वैधता प्रमाण पत्र दाखिल करें प्रत्याशी, वरना पूर्वव्यापी बर्खास्तगी होगी : बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने घोषणा की है कि आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के लिए अनिवार्य है कि वो चुनाव की तारीख के 12 महीने के भीतर जाति की वैधता प्रमाण पत्र प्रस्तुत करे और यदि कोई इसमें विफल रहता है तो इससे पूर्वव्यापी बर्खास्तगी होगी।

औरंगाबाद पीठ में मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नंदराजोग, न्यायमूर्ति आरवी घुगे और न्यायमूर्ति आरजी अवाचत ने आरक्षित सीट पर ग्राम पंचायत के लिए उम्मीदवार के चुनाव के संदर्भ में अनंत एच उलाहलकर बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य मामले में उच्च न्यायालय की एक और पूर्ण पीठ द्वारा दिए गए कारणों पर जवाब दिया है।

पूर्ण पीठ ने महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1958 की धारा 10-1A और महाराष्ट्र नगर परिषद, नगर पंचायत और औद्योगिक टाउनशिप अधिनियम, 1965 की धारा 9 ए का उल्लेख किया। धारा 10-1A में आरक्षित सीट के उम्मीदवार द्वारा जाति प्रमाण पत्र और वैधता प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने को कहा गया है तो धारा 9A भी इसी विषय पर है।

इस प्रकार कोर्ट ने कहा-

"इसे लेकर दो प्रावधान हैं । मुख्य धारा के लिए किसी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या पिछड़े वर्ग के सदस्य के लिए आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ने के इच्छुक व्यक्ति को नामांकन पत्र के साथ सक्षम व्यक्ति द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र जमा करना आवश्यक है। ये महाराष्ट्र अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, डी-नोटिफाइड ट्राइब्स (विमुक्त जाति), घुमंतू जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और विशेष पिछड़ा वर्ग (जारी करने और जारी करने का सत्यापन) के प्रावधानों के अनुसार स्क्रूटनी समिति द्वारा जारी किया गया ( अधिकार और वैधता प्रमाणपत्र ) जाति प्रमाण पत्र अधिनियम, 2000 के तहत होना चाहिए।

उपर्युक्त दोनों वर्गों में पहला प्रावधान

उम्मीदवार को नामांकन पत्र दाखिल करने की अनुमति देता है, बशर्ते उम्मीदवार ने नामांकन दाखिल करने की तारीख से पहले स्क्रूटनी कमेटी को आवेदन किया हो और उसे नामांकन दाखिल करने की तारीख तक जाति की वैधता प्रमाणपत्र प्राप्त न हुआ हो।

दूसरा प्रावधान यह कहता है कि यदि उक्त व्यक्ति निश्चित अवधि में वैधता प्रमाण पत्र पेश करने में विफल रहता है तो उसके चुनाव को पूर्वव्यापी रूप से समाप्त माना जाएगा और ऐसे व्यक्ति को पार्षद होने के लिए अयोग्य घोषित किया जाएगा। "

पूर्ण पीठ ने उल्लेख किया कि अनंत एच उलाहलकर में 1965 के अधिनियम की धारा 9-A के संबंध में उच्च न्यायालय की विभिन्न पीठों के बीच मतभेद थे और मान्यता थी कि यदि जाति की जांच नहीं हुई तो उम्मीदवार उनकी किसी गलती के लिए पूर्वाग्रहित होंगे।

"निर्णय यह कहकर समाप्त होता है कि ये प्रावधान अनिवार्य है और यदि दूसरे प्रावधान के तहत निश्चित अवधि के भीतर कोई वैधता प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं किया जाता है तो इसके परिणाम लागू होंगे।"

पीठ ने कहा कि ये फैसला शंकर सुपुत्र रघुनाथ देवरे (पाटिल) बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य 2019) 3 SCC 220 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के अनुसार है।


फैसले की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें




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