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राजीव धवन की अवमानना याचिका पर 88 वर्षीय प्रोफेसर ने मांगी माफी, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई बंद की

LiveLaw News Network
19 Sep 2019 6:35 AM GMT
राजीव धवन की अवमानना याचिका पर 88 वर्षीय प्रोफेसर ने मांगी माफी, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई बंद की
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सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अयोध्या-बाबरी विवाद मामले की सुनवाई करते हुए वरिष्ठ वकील राजीव धवन द्वारा दायर अवमानना ​​याचिका पर 88 वर्षीय प्रोफेसर एन. शनमुगम के खिलाफ कार्रवाई बंद कर दी है।

अदालत और राजीव धवन से मांगी बिना शर्त माफी

गुरुवार को प्रोफेसर की ओर से पीठ को यह कहा गया कि इसके लिए वो अदालत और राजीव धवन से बिना शर्त माफी मांगते हैं। हालांकि इस दौरान CJI रंजन गोगोई ने कहा कि वो पहले ही 88 वर्ष के हैं। इस पर धवन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि वो इस मामले में कोई सजा नहीं चाहते।

2 सप्ताह में मांगा गया था उनकी ओर से जवाब

दरअसल बीते 3 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एस. ए. बोबडे,जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस. ए. नज़ीर की संविधान पीठ ने अवमानना नोटिस जारी करते हुए उनसे 2 सप्ताह में जवाब मांगा था और उन्हें पेश होने से छूट दे दी थी।

"मुस्लिम पक्षों का प्रतिनिधित्व करने के लिए मिली धमकी"

यह याचिका वरिष्ठ वकील धवन ने दायर की थी जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि उन्हें अयोध्या-बाबरी मस्जिद विवाद में मुस्लिम पक्षों का प्रतिनिधित्व करने के लिए धमकी दी गई थी। धवन ने याचिका में कहा था कि उन्हें 14 अगस्त को चेन्नई के एक प्रोफेसर एन. शनमुगम का पत्र मिला जिसमें उन्हें मुस्लिम पक्षकारों के लिए कोर्ट में पेश होने के लिए धमकी दी गई थी।

88 वर्षीय प्रोफेसर द्वारा कथित रूप से लिखे गए पत्र में पूछा गया था कि धवन कैसे "अयोध्या में उनके तथाकथित अधिकार" के लिए मुसलमानों की ओर से पेश होकर "विश्वासघात" कर सकते हैं। पत्र में वरिष्ठ वकील को शाप दिया गया और कहा गया कि वह "अपनी करनी के लिए कीमत चुकाएंगे।"

"करना पड़ रहा है धमकी भरे व्यवहार का सामना"

राजीव धवन ने अपनी याचिका में कहा कि उन्हें संजय कलई बजरंगी द्वारा भी व्हाट्सएप में धमकी भरे संदेश भेजे गए थे। "यह उल्लेख किया जाना चाहिए कि याचिकाकर्ता को घर पर और अदालत परिसर में कई व्यक्तियों द्वारा धमकी भरे व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है," उन्होंने आगेे कहा।

"मामला 'आपराधिक अवमानना' का है"

याचिका में यह भी कहा गया है कि "डराने वाले पत्र" के जरिए किसी वकील को उसके कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए धमकी देना, न्याय प्रशासन के कामकाज में हस्तक्षेप करने के समान है और इसलिए ये 'आपराधिक अवमानना' का मामला है।

AG एवं SG से आपराधिक अवमानना ​​के लिए अनिवार्य मंजूरी नहीं लेने का कारण

आपराधिक अवमानना ​​के लिए अटॉर्नी जनरल की अनिवार्य मंजूरी नहीं लेने के कारण के रूप में धवन ने AG की ओर से हितों के संभावित संघर्ष का हवाला दिया, क्योंकि वह मामले के पहले दौर में उत्तर प्रदेश राज्य के लिए पेश हुए थे। सॉलिसिटर जनरल के संबंध में धवन ने कहा कि SG ने वर्तमान मामले की पूर्व सुनवाई में यूपी सरकार के लिए पक्ष लिया था।

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