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इच्छा मृत्यु : सुप्रीम कोर्ट लिविंग विल /एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव के दिशानिर्देशों में संशोधन करने को सहमत, आदेश जारी करेगा

LiveLaw News Network
24 Jan 2023 1:43 PM GMT
इच्छा मृत्यु  :  सुप्रीम कोर्ट लिविंग विल /एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव के दिशानिर्देशों में संशोधन करने को सहमत, आदेश जारी करेगा
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सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने मंगलवार को इस बात पर सहमति जताई कि इच्छा मृत्यु यानी लिविंग विल /एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव के दिशानिर्देशों में संशोधन करने की आवश्यकता है, जो कॉमन कॉज बनाम भारत संघ और अन्य मामले में ' इच्छामृत्यु' को मान्यता देते हुए फैसले द्वारा जारी किया गया था।

जस्टिस के एम जोसेफ, जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस सी टी रविकुमार इंडियन काउंसिल फॉर क्रिटिकल केयर मेडिसिन द्वारा दायर एक विविध आवेदन पर विचार कर रहे थे, जिसमें लिविंग विल/एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव के दिशानिर्देशों में संशोधन की मांग की गई थी क्योंकि इसके पिछले निर्देश अव्यवहारिक हो गए हैं। सीनियर एडवोकेट अरविन्द दातार द्वारा इसके कार्य ना करने का एक उदाहरण प्रदान किया गया था, जिसे पीठ ने नोट किया था। पिछले आदेश में कहा गया था कि दो स्वतंत्र अनुप्रमाणित गवाहों की उपस्थिति में अग्रिम चिकित्सा निर्देश दिया जाना चाहिए। प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा काउंटक साइन निर्देश प्राप्त करने के लिए एक आवश्यकता निर्धारित की गई थी। आवेदकों ने तर्क दिया कि इस आवश्यकता ने प्रक्रिया को बोझिल बना दिया है और प्रार्थना की है कि इसे रद्द कर दिया जाए।

चार दिनों की अवधि में, बेंच ने सभी हितधारकों के साथ कई बैठकें करने के बाद आवेदक द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार-विमर्श किया। पिछले अवसर पर, पीठ ने कहा कि यह सभी के हित में होगा, यदि आवेदक और केंद्र सरकार संशोधनों के लिए एक संयुक्त प्रस्ताव लेकर आए। तदनुसार, पक्षकारों के वकीलों को एक साथ बैठकर एक सामान्य चार्ट तैयार करने की सलाह दी गई। कोर्ट ने मंगलवार को इस पर विचार किया।

दातार ने प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड और समीक्षा बोर्ड द्वारा किए जाने वाले विचार के लिए आवंटित समय को 48 घंटे की पिछली आवश्यकता से 24 घंटे करने का सुझाव दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार ने समय-सीमा 48 घंटे करने का सुझाव दिया है। जस्टिस जोसेफ की राय थी कि 48 घंटे उचित समय सीमा है। दातार ने कहा कि अगर 48 घंटों को स्वीकार किया जाता है, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि विचार '48 घंटों के भीतर' होगा।

दातार ने संकेत दिया कि समीक्षा बोर्ड की कोई आवश्यकता नहीं हो सकती है। लेकिन केंद्र सरकार इसे नियंत्रण और संतुलन तंत्र के रूप में बनाए रखना चाहती है। स्पष्टता प्राप्त करने के लिए, जस्टिस जोसेफ ने पूछा कि 48 घंटे कब से शुरू होंगे। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल, के एम नटराज ने जवाब दिया, "एक बार बोर्ड का गठन हो गया तब।”

लेकिन, दातार ने प्रस्तुत किया कि यह उस समय से माना जाएगा जब इलाज करने वाले डॉक्टरों को पता चलेगा कि ' मौत अपरिहार्य है'।

मामले के संबंध में कुछ चर्चा हुई जहां कोई अग्रिम चिकित्सा निर्देश नहीं है। दातार ने पीठ को अवगत कराया कि ऐसे सभी मामलों में परिजनों की सहमति को ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह नोट किया गया कि अग्रिम निर्देश के बिना भी, इच्छामृत्यु का अभ्यास किया जा रहा है। दातार ने प्रस्तुत किया कि सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश डॉक्टरों की सुरक्षा में एक लंबा रास्ता तय करेगा। जस्टिस जोसेफ ने परिवार की परिभाषा के बारे में पूछताछ की और कहा कि अगर परिवार के करीबी सदस्यों द्वारा अलग-अलग दृष्टिकोण लिया जाता है तो क्या होगा।

पहले मेडिकल बोर्ड में डॉक्टरों को कम से कम 20 साल का अनुभव होना निर्धारित था। इस तरह के लंबे अनुभव वाले डॉक्टरों को खोजने में कठिनाई का हवाला देते हुए, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, मांगा गया संशोधन न्यूनतम अनुभव की आवश्यकता को घटाकर 5 वर्ष करना था। हालांकि, इच्छामृत्यु मामले में एमिकस, एडवोकेट, डॉ आर आर किशोर का मानना था कि डॉक्टरों के अनुभव को सीमित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। हालांकि, उन्होंने सुझाव दिया कि बोर्ड में 'संबंधित विशेषता के विषय-विशेषज्ञ' होने चाहिए।

अनुभव के लिए आयु सीमा निर्धारित करने के पहलू पर किशोर से असहमत, जस्टिस जोसेफ ने बोर्ड में 'संबंधित विशेषता के विषय-विशेषज्ञों' के साथ डॉक्टरों को जोड़ने की चिंता को मान्यता दी।

जस्टिस जोसेफ ने पूछा, "अस्पताल से ही सेकेंडरी बोर्ड का गठन होगा?"

एएसजी ने जवाब दिया कि, हालांकि यह अस्पताल द्वारा गठित किया गया है, बोर्ड में कम से कम एक डॉक्टर को सीएमओ द्वारा नामित किया जाना चाहिए। दातार ने बड़े शहरों में सीएमओ का पता लगाने में आने वाली कठिनाइयों की ओर इशारा किया।

विशिष्ट निर्देशों के साथ विस्तृत आदेश की प्रतीक्षा है। एक बार आदेश टाइप हो जाने के बाद, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को आदेश की एक प्रति हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरलों को उपलब्ध कराने के लिए निर्देशित किया गया था, जो बदले में राज्यों/संघ शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य सचिवों व राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में सीएमओ को आगे संचार के लिए इसकी एक प्रति प्रदान करेंगे।

[केस : कॉमन कॉज बनाम भारत संघ एमए 1699/2019 डब्ल्यूपी (सी) नंबर 215/2005]

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