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अयोध्या मामले की सुनवाई का 13वां दिन, निर्मोही अखाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, देवता के दावे का विरोध नहीं कर रहे

LiveLaw News Network
28 Aug 2019 9:48 AM GMT
अयोध्या मामले की सुनवाई का 13वां दिन,  निर्मोही अखाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, देवता के दावे का विरोध नहीं कर रहे
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हिंदू पक्षकार 'निर्मोही अखाड़ा' ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को यह बताया कि वह अयोध्या में विवादित रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि के टाइटल के लिए देवता राम लला के मुकदमे का विरोध नहीं कर रहा है।

अखाड़ा ने अदालत के सवाल के बाद साफ किया अपना रुख

अखाड़ा ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ को अपने रुख से अवगत कराया क्योंकि पीठ ने उनसे यह पूछा था कि क्या वह संपत्ति पर शबैत (भक्त) के अधिकार के मद्देनजर देवता की याचिका का विरोध करता है? गौरतलब है कि उसका अधिकार तभी रह सकता है जब 'रामलला विराजमान' के मुकदमे की अनुमति हो।

"यदि अखाड़ा के शबैत के अधिकार पर विवाद नहीं तो सूट नंबर 5 की योग्यता पर विवाद नहीं"

"कल पीठ ने जो पूछा था, उसके जवाब में, 'निर्मोही अखाड़ा' का स्टैंड यह है कि यह सूट नंबर 5 (अपने 'नेक्स्ट फ्रेंड' देवकी नंदन अग्रवाल के माध्यम से देवता द्वारा दायर) के सुनवाई योग्य ना होने की बात नहीं करेगा, बशर्ते कि वे (देवता के वकील)भी अखाड़ा के शबैत के अधिकार पर विवाद ना करें," वरिष्ठ वकील सुशील जैन ने हिंदू पक्षकार की ओर से पीठ को बताया।

अखाड़ा के रुख पर उठे थे प्रश्न

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एस. ए. बोबडे,जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस. ए. नज़ीर की पीठ ने भी जैन के इस रुख की आलोचना की कि देवता का मुकदमा सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि मुकदमा चलाने के लिए 'अखाड़ा' के पास देवता की ओर से अकेले 'शबैत' का अधिकार है।

"आप (अखाड़ा) एक साथ खड़े होते हैं और आप एक साथ गिरेंगे ... आप मस्जिद के 'शबैत' नहीं हो सकते," पीठ ने चुटकी लेते हुए अखाड़ा को अपना रुख साफ करने का निर्देश दिया।

"दशकों से मंदिर रहा है अखाड़ा के कब्जे में"

दशकों पुराने संवेदनशील मामले के 13वें दिन दलीलों को आगे बढ़ाते हुए जैन ने कहा कि वर्ष 1934 के बाद से नियमित रूप से 'नमाज' की पेशकश करने के लिए किसी भी मुस्लिम ने विवादित इमारत में प्रवेश नहीं किया और मंदिर 'अखाड़ा' के कब्जे में रहा है। पीठ ने कहा, "आपने यह सब कल पढ़ा है। कृपया जो आपने पहले ही पढ़ा है, उसे ना दोहराएं।"

जैन ने कहा कि मुस्लिम पक्ष की दलील है कि एक ठेकेदार को वर्ष 1934 में सांप्रदायिक दंगे के बाद विवादित ढांचा दुरुस्त करने के लिए कहा गया था, इस तथ्य को देखते हुए विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि वहां पर राजस्व रिकॉर्ड के हिसाब से भी 'अखाड़ा' का कब्जा है।

अखाड़ा ने विवादित स्थल पर अपने कब्जे के इतिहास को समझाया

वरिष्ठ वकील ने कहा कि मामले में मुस्लिम पक्षों के मुकदमे "निराशाजनक रूप से समय-वर्जित" रहे हैं क्योंकि उन्होंने कार्रवाई के कारण के बाद समय के भीतर कानूनी उपचार के लिए अदालत का रुख नहीं किया था। उन्होंने कहा कि कार्रवाई का पहला कारण वर्ष 1855 में होने वाला दंगा था जिसके बाद मुसलमानों ने स्थल पर कब्जा कर लिया और कुछ समय बाद हिंदुओं ने इसे वापस ले लिया था। फिर वर्ष 1934 में मुसलमानों पर दंगों के बाद उक्त स्थल पर 'नमाज़' की पेशकश पर रोक लगा दी गई और 12 साल बीत जाने के बाद भी उन्होंने मुकदमा दाखिल नहीं किया। 'सुन्नी वक्फ बोर्ड' ने वर्ष 1961 में मामला दायर किया था जिसे खारिज कर दिया गया था।

'अखिल भारतीय श्री राम जन्मभूमि पुनरोद्धार समिति' की दलीलें

इसके बाद 'अखिल भारतीय श्री राम जन्मभूमि पुनरोद्धार समिति', जो कि एक मुस्लिम पक्ष द्वारा दायर मुकदमे में प्रतिवादियों में से एक हैं, की ओर से पेश वरिष्ठ वकील पी. एन. मिश्रा, ने 'स्कंदपुराण' और 'अयोध्या महात्म्य' जैसे धार्मिक ग्रंथों और बाबर नामा पर अपनी दलीलें निर्भर रखीं। उन्होंने यह स्टैंड लिया कि बाबर कभी भी अयोध्या नहीं गया था और उसने वहां कोई मस्जिद और निर्माण नहीं किया था, वहां मुगल सम्राट के कथित सेनापति और मस्जिद के निर्माता मीर बकी नाम का कोई व्यक्ति नहीं था।

"अनादि काल से हम कर रहे हैं स्थल पर पूजा"

मिश्रा ने कहा, "हमारा मामला थोड़ा अलग है। हमने उच्च न्यायालय के समक्ष यह प्रस्तुत किया है कि बाबर ने मस्जिद का निर्माण नहीं किया था। मीर बकी जैसा कोई व्यक्ति नहीं था ... हमारा मामला यह है कि अनादि काल से हम वहां पूजा करते आ रहे हैं।"

मिश्रा ने कहा, "हमने 2 तथ्य रखे हैं। पहला, यह (विवादित ढांचा) बाबर द्वारा नहीं बनाया गया था और दूसरा, तीन गुंबद वाली संरचना को मस्जिद नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसमें मस्जिद की विशेषताओं का अभाव था।"

अदालत ने मंदिर के अस्तित्व को स्थापित करने के लिए मांगे ठोस सबूत

शुरुआत में, मिश्रा ने 'स्कंद पुराण' और 'वाल्मीकि रामायण' सहित अन्य धार्मिक ग्रंथों का जिक्र करते हुए कहा कि भगवान राम का 'जन्मस्थान' मंदिर है। पीठ ने तब धार्मिक ग्रंथों के संदर्भ पर सवाल उठाते हुए कहा कि वे विश्वास और आस्था स्थापित करने के लिए फायदेमंद हो सकते हैं लेकिन वो मंदिर के अस्तित्व को स्थापित करने में कैसे मदद करेंगे।

मिश्रा ने धर्मग्रंथों और शोध कार्यों पर विचार करने का अदालत से किया आग्रह

मिश्रा ने कहा कि किसी मुकदमे का फैसला करने के लिए धर्मग्रंथों और शोध कार्यों पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने अयोध्या में भगवान राम के जन्म स्थान को दिखाने के लिए एक नक्शे का भी उल्लेख किया। मुस्लिम पक्षकारों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने नक्शे में कथित विसंगतियों का मुद्दा उठाया तो मिश्रा ने कहा कि पुस्तक, नक्शे से युक्त, अभिलेखों का हिस्सा है। जब एएसआई ने साइट की खुदाई की तो उन्हें 7 स्तंभों की कतारें मिलीं और हिंदू परंपराओं के अनुसार ये कुल 85 स्तंभ थे।

"मैंने हाई कोर्ट में साबित किया है कि पत्थर के शिलालेख जाली थे," उन्होंने कहा कि 2 शिलालेखों में मस्जिद के निर्माण का अलग-अलग समय था। उन्होंने कहा कि कुछ मुसलमानों का कहना है कि बाबर ने मस्जिद का निर्माण किया, दूसरों ने कहा कि यह औरंगज़ेब था जिसने काशी, मथुरा और अयोध्या जैसे 5 हिंदू धार्मिक स्थानों पर मस्जिदें बनाई थीं।

अदालत ने पूछा विवादित स्थल का 'वक्फ' किसने बनाया१

अदालत ने फिर पूछा कि विवादित स्थल का 'वक्फ' किसने बनाया१ "उनके अनुसार, यह बाबर था। 'वक्फ' बनने की संपत्ति के लिए, पहली बात यह है कि 'वक्फ' का मालिक होना चाहिए क्योंकि अगर 'वक्फ' बनाने के समय जमीन का स्वामित्व नहीं है, तो यह नहीं हो सकता है। ये इस्लाम के धार्मिक सिद्धांतों के खिलाफ है। हमारा मामला यह है कि मूर्तियाँ प्राचीन काल से ही वहां हैं," उन्होंने कहा।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 4 सिविल मुकदमों पर वर्ष 2010 के अपने फैसले में, 2.77 एकड़ विवादित भूमि को तीन पक्षों सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच समान रूप से विभाजित किया था। फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 अपील दायर की गई हैं जिन पर सुनवाई चल रही है।

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