वैकल्पिक उपचार उपलब्ध होने के बावजूद हाईकोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार के प्रयोग पर पूरा प्रतिबंध नहीं : सुप्रीम कोर्ट

वैकल्पिक उपचार उपलब्ध होने के बावजूद हाईकोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार के प्रयोग पर पूरा प्रतिबंध नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वैकल्पिक उपचार का नियम विवेक का नियम है, क्षेत्राधिकार का नहीं। शीर्ष अदालत ने कहा कि वैकल्पिक उपचार उपलब्ध होने के बावजूद हाईकोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार के प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।

न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। इस मामले में मुद्दा यह उठा था कि सशस्त्र बल अधिकरण अधिनियम, 2007 को देखते हुए सशस्त्र बल के एक कर्मी के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में लंबित मामले को सशस्त्र बल अधिकरण (एएफटी) को भेजा जाए या हाईकोर्ट उसकी सुनवाई करे।

हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने कहा कि अगर इस तरह का कोई मुक़दमा हाईकोर्ट में इस अधिकरण के गठन से पहले लंबित था, ऐसे मामलों को अधिकरण को नहीं भेजा जाएगा।

दलील यह दी गई थी कि एएफटी अधिनियम के तहत आने वाले मामलों के संदर्भ में हाईकोर्ट का स्थान लेगा, लेकिन पीठ इससे सहमत नहीं थी।

पीठ ने कहा,

"अधिनियम की धारा 14(1) के तहत कहा गया है कि एएफटी सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के अलावा अनुच्छेद 226 और 227 के तहत सभी अदालतों के अधिकारों का प्रयोग करेगा। धारा 34 में कहा गया है कि हर मामला या अन्य कार्यवाही जो कि हाईकोर्ट सहित किसी भी अदालत में अधिकरण के गठन से पहले से लंबित है, उस दिन ट्रिब्यूनल के पास ट्रांसफ़र माना जाएगा। विधायिका ने एएफटी को हाईकोर्ट का अधिकार नहीं दिया है जिसका वह संविधान की धारा 226 के तहत प्रयोग कर सके।"

पीठ ने कहा कि चूंकि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में एक अपील लंबित है तो हाईकोर्ट अपने विशेष रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग न कर सके, क्योंकि प्रभावी वैकल्पिक उपचार उपलब्ध है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार उससे छीन लिया गया है।

अदालत ने कहा,

"यहाँ यह जोड़ना ज़रूरी होगा कि यह सिद्धांत कि हाईकोर्ट को अपने विशेष रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए जब कोई वैकल्पिक प्रभावी उपचार उपलब्ध है, यह समझदारी का नियम है किसी क़ानून का नहीं…वैकल्पिक उपचार का नियम विशेषाधिकार है न कि क्षेत्राधिकार का नियम…।

एक आम मुक़दमादार के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील करना काफ़ी मुश्किल काम है, इसलिए यह हाईकोर्ट को निर्णय करना है कि उसे अपने विशेष रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग करना चाहिए कि नहीं…इसलिए इस तरह के क्षेत्राधिकार के प्रयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध नहीं हो सकता है क्योंकि इसका अर्थ प्रभावी रूप से यह होगा कि रिट अदालत को किसी भी इस तरह की रिट याचिका की सुनवाई करने के उसके क्षेत्राधिकार से वंचित कर दिया जाएगा और एल चंद्रकुमार के मामले में जिस क़ानून को निर्धारित किया गया है वह यह नहीं है।"

पीठ ने कहा,

" संविधान के अनुच्छेद 214 के तहत हाईकोर्ट एक संवैधानिक अदालत है और अनुच्छेद 215 के तहत वह रिकॉर्ड का कोर्ट है। यह स्पष्ट है कि हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट के अलावा अन्य किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। अंतर-अदालतीय अपील का प्रावधान चाहे वह लेटर्स पैटेंट्स या स्पेशल एनैक्ट्मेंट, एक ऐसी व्यवस्था है जो हाईकोर्ट के अधीन फ़ैसले में सुधार का मौक़ा देता है, जहां एकल जज के दिए गए फ़ैसले को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।

जहां भी इस तरह की अपील है, इसकी सुनवाई हाईकोर्ट के दो या दो से अधिक जज करते हैं। हम एक ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं कर सकते जहाँ हाईकोर्ट के एक वर्तमान जज के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की सुनवाई कोई अधिकरण करे जिसमें एक अवकाश प्राप्त जज और सेना का एक अवकाश प्राप्त अधिकारी बैठा हो।"

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