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एनसीएलएटी ने कंपनियों के विलय के मामले में शेयरधारकों और ऋणदाताओं की बैठक बुलाने के मुद्दे पर उत्पन्न भ्रम को ख़त्म किया

LiveLaw News Network
15 Sep 2019 4:02 AM GMT
एनसीएलएटी ने कंपनियों के विलय के मामले में शेयरधारकों और ऋणदाताओं की बैठक बुलाने के मुद्दे पर उत्पन्न भ्रम को ख़त्म किया
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मामला : डीएलएफ फ़ेज़-IV कमर्शियल डेवलपर्स लिमिटेड एंड अदर्स, कम्पनी अपील (एटी) नम्बर 180, 2019; फ़ैसले की तिथि : 19 अगस्त 2019

राष्ट्रीय कंपनी क़ानून अपीली अधिकरण (एनसीएलएटी) ने एक ऐतिहासिक फ़ैसले में राष्ट्रीय कंपनी क़ानून अधिकरण (एनसीएलटी), चंडीगढ़ के एक फ़ैसले को इस आधार पर निरस्त कर दिया की जो फ़ैसला दिया गया था उसका कोई वैधानिक आधार नहीं था। ऐसा इसलिए क्योंकि उसने अपीलकर्ता कंपनी के शेयरधारकों और ऋणदाताओं की कुछ बैठकों को आयोजित कराने से मना कर दिया था और कहा था कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 230-232 के तहत इस तरह की व्यवस्था की अनुमति नहीं है।

एनसीएलटी की विभिन्न पीठों ने इस मुद्दे पर विरोधाभासी फ़ैसले दिए जिसकी वजह से इस मामले में अस्पष्टता बढ़ गई। एनसीएलटी की कुछ पीठों ने ख़ुद को बैठकें आयोजित करने के इस न्यायिक अधिकार से वंचित रखा जबकि इसके लिए 100 फ़ीसदी सदस्यों/ऋणदाताओं की सहमति प्राप्त लिखित में प्राप्त थी। इसके अलावा कुछ पीठों ने अपने अधिकारों का प्रयोग कर इस तरह की बैठकें कराई जबकि इसके लीए किसी तरह की लिखित सहमति नहीं ली गई थी।

वरिष्ठ वक़ील डॉक्टर यूके चौधरी ने एनसीएलटी की चंडीगढ़ पीठ के समक्ष अपनी दलील में कहा कि वर्तमान मामले में शेयरधारकों और ऋणदाताओं की बैठक बुलाने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि स्थानांतरण करने वाली कंपनी स्थानांतरित हुई कंपनी की एक पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी है और योजनाओं पर अमल के तहत न तो कोई शेयर जारी किया जाएगा और न ही ये आवंटित किए जाएँगे।

स्थानांतरित हुई कंपनी के सदस्यों के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ा है और इस योजना से आम शेयरधारकों की स्थिति कमज़ोर नहीं होगी। यह भी कहा गया कि इस योजना से ऋणदाताओं पर भी कोई असर नहीं होगा क्योंकि योजना के तहत उनके दावे में कोई कमी नहीं की गई है और योजना के लागू होने के बाद स्थानांतरित हुई कंपनी का नेट वर्थ काफ़ी धनात्मक होगा। इस फ़ैसले के लिए एनसीएलटी की कई सहयोगी पीठों के फ़ैसलों पर भरोसा किया गया जिनमें एनसीएलटी की पूर्ण पीठ के फ़ैसले और कुछ हाइकोर्टों के फ़ैसले भी शामिल हैं।

हालाँकि एनसीएलटी ने इस तरह का कोई आयोजन करने से यह कहते हुए मना कर दिया कि शेयरधारकों या ऋणदाताओं के मामले में इस तरह के आयोजन की कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के तहत अनुमति नहीं है विशेषकर अगर इसे अधिनियम की धारा 230(9) के सा पढ़ा जाए।

एनसीएलएटी ने एनसीएलटी के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि इस मामले पर दुबारा ग़ौर किया जाए और यह भी कि अधिकरण को पूर्व क़ानूनी दृष्टांतों के अनुरूप अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करना चाहिए। एनसीएलएटी ने कहा कि इतने ही सदस्यों वाले किसी सहयोगी पीठ केजो इस पर भिन्न राय रखती है, के लिए एकमात्र रास्ता यह बचा है कि मामले को किसी बड़ी पीठ को सौंप दिया जाए। अपीलकर्ताओं की पैरवी नवीन दहिया, मनीषा चौधरी और हिमांशु हांडा ने की।


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