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एनसीडीआरसी ने दिया दून इंटरनेशनल स्कूल को निर्देश, पूर्व छात्रा को समय पर टीसी जारी न करने पर दिए जाएं पचास हजार रुपये

LiveLaw News Network
11 Oct 2019 9:12 AM GMT
एनसीडीआरसी ने दिया दून इंटरनेशनल स्कूल को निर्देश,  पूर्व छात्रा को समय पर टीसी जारी न करने पर  दिए जाएं पचास हजार रुपये
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राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने बुधवार को दून वैली इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल, हिमाचल प्रदेश को निर्देश दिया है कि वह एक पूर्व छात्रा को 50000 रुपये मुआवजा दे। इस छात्रा को स्कूल समय पर स्थानांतरण प्रमाण पत्र (टीसी) जारी नहीं कर पाया था , जिसके कारण उसका एक साल बर्बाद हो गया।

डॉक्टर एसएम कांतिकार और दिनेश सिंह की पीठ ने कहा,

"स्कूल प्राधिकारियों द्वारा सामान्य और तथ्यात्मक रूप से स्कूल स्थानांतरण प्रमाण पत्र (टीसी) जारी करने में लापरवाही या मनमाने तरीके से कार्य नहीं किया जा सकता। इस तरह के प्रमाणपत्र छात्र के करियर से जुड़े हैं और इस संबंध में विद्यार्थी द्वारा अनुरोध करने पर प्रमाण पत्र उसे जल्द से जल्द उचित जिम्मेदारी के साथ जारी किया जाना चाहिए।''

स्कूल ने राज्य आयोग के आदेश के खिलाफ एक पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। राज्य आयोग ने पीड़ित छात्रा रवलीन कौर की तरफ से दायर याचिका को स्वीकार कर लिया था और उसे पचास हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था। इसी के साथ राज्य आयोग ने वर्ष 2008 में जिला फोरम द्वारा दिए गए आदेश को रद्द कर दिया था। इससे पहले जिला फोरम ने पीड़ित छात्रा की अर्जी को खारिज किया था।

यह था मामला

रवलीन नौवीं कक्षा का छात्रा थी और उसने 2005 में टीसी के लिए स्कूल में आवेदन दिया था, लेकिन उसे समय पर प्रमाण पत्र नहीं दिया गया, जिस कारण उसे एक शैक्षणिक वर्ष का नुकसान हुआ था।

एनसीडीआरसी ने राज्य आयोग के निष्कर्षों के साथ सहमति जताई और कहा कि स्कूल द्वारा समय पर ट्रांसफर सर्टिफिकेट (टीसी) जारी न करना केवल उनकी सेवा में 'कमी'का मामला नहीं था, बल्कि प्रमाण पत्र को रोककर रखना अनुचित व्यापार अभ्यास (अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस) का गठन करता है।

इस बात पर भी सहमति व्यक्त की गई कि प्रतिवादी छात्रा अदालत में तभी आई होगी जब उसने टीसी के लिए अधिकारियों से संपर्क किया और उसे यह जारी नहीं किया गया था। इस दृष्टि से, आयोग ने राज्य आयोग के निष्कर्षों को दोहराया।

एनसीडीआरसी ने कहा,

''शिकायत दर्ज करने के बाद भी टीसी क्यों नहीं जारी की गई?, केवल प्रतिवादियों के वकील द्वारा यह जवाब दिया गया था, कि जब तक स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र लिखित रूप में नहीं मांगा जाता है, तब तक उनके मुविक्कल इसको जारी करने के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। इस दलील को खारिज कर दिया जा रहा है।''

एनसीडीआरसी ने इस ओर भी ध्यान दिया कि

''यहां तक कि जब उपभोक्ता शिकायत दर्ज की गई थी, तब भी याचिकाकर्ता स्कूल उचित जिम्मेदारी के साथ कार्य कर सकता था और तुरंत उसके अनुरोध पर टीसी जारी कर सकता था।''

आयोग ने कहा कि उनका मानना है कि प्रतिवादी शैक्षिक स्तर पर किस तरह की छात्रा थी, इसका स्थानांतरण प्रमाणपत्र जारी करने के साथ कोई लेना-देना नहीं था, इसलिए-

''याचिकाकर्ता स्कूल का तर्क कि वह शैक्षणिक रूप से एक 'कमजोर' छात्रा थी, इसका सामान्य और तथ्यात्मक रूप से स्कूल छोड़ने का स्थानांतरण प्रमाण पत्र जारी करने के मामले से कोई लेना-देना या संबंध नहीं है। यह भी किसी की दलील का हिस्सा नहीं था कि उसे (गलती से) स्थानांतरण प्रमाणपत्र में 'अच्छी' छात्रा के रूप में दिखाया जाना था।''

यह देखते हुए कि स्कूल ने ''अनावश्यक और अस्वाभाविक रूप से गैर ज़िम्मेदार तरीके से काम किया'', आयोग ने राज्य आयोग के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें मुकदमेबाजी की लागत के सहित प्रतिवादी को कुल 50,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्णय दिया गया था।

फैसला डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें


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