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सीईटी का क्लियर होना, एडमिशन की गारंटी नहीं है : बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
24 Nov 2019 4:15 AM GMT
सीईटी का क्लियर होना, एडमिशन की गारंटी नहीं है : बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने क़ानून की पढ़ाई करने की मंशा रखने वाले दो लोगों को निराश किया है और कहा है कि कॉमन एंट्रन्स टेस्ट पास कर लेना उन्हें एडमिशन का गारंटी नहीं देता है। अदालत ने कहा कि ये छात्र 2015 में जो मानदंड लागू किए गए थे उसको पूरा नहीं कर पाए। इसके अनुसार छात्रों को ग्रैजूएशन की हर साल की परीक्षा में न्यूनतम 45% अंक प्राप्त करना चाहिए तभी जाकर उनको कॉमन एडमिशन प्रॉसेस (सीएपी) में शामिल किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति एससी धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति आरआई चागला की खंडपीठ ने दो रिट याचिकाओं पर विचार किया जिसे पूर्वा इंगले और विनय कोठरी ने दायर की थी। अदालत ने इन दोनों याचिकाओं को यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि दोनों ही छात्र प्रवेश के योग्य नहीं पाई गईंं।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे लोग 45% की न्यूनतम अर्हता के बारे में नहीं जानते थे।

याचिकाकर्ता के वक़ील राशिद खान ने कहा कि उनके मुवक्किल अर्हता पूरी नहीं कर पाने के कारण अपने सपने पूरे नहीं कर पाएँगे और जब सीट ख़ाली है तो उन्हें प्रवेश लेने की अनुमति दी जाए, लेकिन अदालत ने उनकी दलील मानने से इंकार कर दिया।

अदालत ने कहा :

"इस मामल में, यह कहना ठीक नहीं होगा कि याचिकाकर्ता विनय कोठारी लाचार है और वक़ील बनने के अपने सपने को पूरा नहीं कर सकता। जब सीईटी और सीएपी लागू किया गया था, तो इस उम्मीदवार ने एक विधि कॉलेज में अपनी डिग्री परीक्षा में हासिल परिणाम के आधार पर दाख़िला लिया था। हालाँकि, तीन साल के डिग्री कोर्स में वह प्रथम वर्ष में फ़ेल हो गए।

प्रवेश प्रक्रिया में शामिल होने में किसी भी तरह से कोई रोक नहीं है पर विधिसम्मत नियम उनके प्रवेश लेने के रास्ते में आड़े आ रही है। 2015 में एक क़ानून लागू किया गया था जिसने महाराष्ट्र राज्य और उसके उच्च और तकनीकी शिक्षा विभाग को छात्रों के चयन में इसे लागू करने का अधिकार दिया। सीएपी से पहले सीईटी आयोजित होता है जिसमें प्रवेश पाने के इच्छुक सभी लोगों को भाग लेना होता है और इसमें पास होने के बाद ही उन्हें सीएपी में प्रवेश दिया जाता है। सो, सिर्फ़ इस वजह से किसी ने सीईटी पास कर लिया है, उसे प्रवेश की गारंटी नहीं दी जा सकती है। प्रवेश पाने के लिए हरेक उम्मीदवार को इसकी अर्हता की शर्तों को पूरा करना आवश्यक है।"

अदालत ने इस दलील को भी ख़ारिज कर दिया कि विनय 45% की सीमा को बहुत कम अंतर से नहीं छू पाए हैं और उनके अंक को 45% कर देना चाहिए।

उनकी इस दलील को हताशा बताते हुए अदालत ने कहा :

"छात्र को नियम को अवश्य ही मानना चाहिए। अंक को राउंड ऑफ़ करने की माँग कोई अधिकार नहीं है। जो उम्मीदवार फ़ेल हो गया है वह अदालत से इस बात का आग्रह नहीं कर सकता कि उसके अंक को राउंड ऑफ़ कर दिया जाए ताकि वह इसमें प्रवेश पाने की योग्यता पा ले। हम नहीं समझते हैं कि न्यायिक क्षेत्राधिकार इस उद्देश्य के लिए है या इस तरह के छात्र को वह क़ानून के कोर्स में प्रवेश लायक़ बना सके। आम लोगों को यह बताने की कोशिश की जा रही है कि वक़ील बनने के लिए आपको न तो बेसिक योग्यता की ज़रूरत है और न ही आपको बेसिक मानदंड और नियम का पालन करने की ज़रूरत है जिसे दूर करने की ज़रूरत है।"

इस तरह इन दोनों याचिकाओं को, जो कि एक ही जैसी हैं, को अदालत ने ख़ारिज कर दिया।


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