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डिपोजिट के लिए अतिरिक्त समय लेना वादी को करार की प्रतिबद्धता साबित करने के दायित्व से मुक्त नहीं करता : सुप्रीम कोर्ट का फैसला

LiveLaw News Network
11 Oct 2019 5:59 AM GMT
डिपोजिट के लिए अतिरिक्त समय लेना वादी को करार की प्रतिबद्धता साबित करने के दायित्व से मुक्त नहीं करता : सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि करार की शेष राशि के भुगतान के लिए केवल अतिरिक्त समय लेना ही वादी को बिक्री समझौते के अनुपालन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता साबित करने के दायित्व से मुक्त नहीं करेगा।

न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की पीठ ने कहा है कि अतिरिक्त मोहलत दिये जाने से वादी खुद से यह नहीं मान सकता कि इससे उसकी करार को लेकर प्रतिबद्धता साबित होती है।

पीठ 'रवि सेतिया बनाम मदन लाल एवं अन्य' के मामले में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ वादी की अपील की सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट ने करार की शर्तों के अनुपालन को लेकर निचली अदालतों के दो समान फैसलों को निरस्त कर दिया था।

वादी ने झूठे तथ्यों के आधार पर रकम जमा कराने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की

हाईकोर्ट ने कहा था कि वादी ने निर्धारित समय के भीतर बिक्री करार की शर्तों के अनुरूप शेष राशि का भुगतान नहीं किया था। वादी ने झूठे तथ्यों के आधार पर रकम जमा कराने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की थी। इन तथ्यों के आाधार पर हाईकोर्ट ने कहा था कि वादी स्पेशल रिलीफ एक्ट, 1963 की धारा 16(सी) के तहत करार की शर्तों के अनुपालन के प्रति अपनी 'मुस्तैदी और स्वेच्छा' साबित नहीं कर सका था।

समझौते के तहत निश्चित अदायगी (स्पेशल परफॉर्मेंस) के मामले में अपने हक में आदेश के लिए वादी को धारा 16(एक)(सी) के तहत अपनी देनदारी को लेकर 'मुस्तैदी और स्वेच्छा' प्रदर्शित करनी होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील में पाया है कि ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने वादी की एक दलील को ही उसकी 'मुस्तैदी और स्वेच्छा' के लिए पर्याप्त माना कि वह विलेख के लिए निर्धारित तिथि को सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय में मौजूद था, लेकिन इस तथ्य को साबित करने के लिए कोई अन्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया था।

राशि जमा कराने की तारीख समाप्त होने के बाद वादी ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष अर्जी दायर की थी कि प्रतिवादी की प्रथम अपील लंबित होने के मद्देनजर राशि जमा करने की तारीख बढ़ायी जानी चाहिए, अन्यथा बगैर ब्याज के ही रकम बैंक में फंसी रहेगी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त समय के अनुरोध के लिए इसे निराधार तर्क माना।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वादी ने इंतजार करने और पहली अपील में अपने पक्ष में संभावित फैसले पर अमल को प्राथमिता दी।

"निस्संदेह, अधिनियम की धारा 28 के तहत रकम जमा कराने का समय बढ़ाया जा सकता है, लेकिन राशि जमा कराने के लिए केवल अतिरिक्त समय लेना ही वादी को बिक्री समझौते के अनुपालन के प्रति उसकी 'मुस्तैदी और स्वेच्छा' साबित करने के दायित्व से मुक्त नहीं करता, जबकि इस तरह की मांग के लिए विशेष परिस्थितियां उसके नियंत्रण से बाहर थी।

अतिरिक्त मोहलत दिये जाने से वादी की ओर से करार को लेकर 'मुस्तैदी और स्वेच्छा" स्वत: साबित नहीं हो जाती। वादी को राशि जमा कराने के अतिरिक्त समय के लिए पर्याप्त, सारभूत और अकाट्य साक्ष्य देने चाहिए थे, अन्यथा इस मामले के तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में अन्य सहवर्ती परिस्थितियों सहित यह उसके व्यवहार पर प्रश्नचिह्न है।"

"निर्धारित समय के भीतर शेष रकम का जमा न करा पाने को लेकर कोई स्पष्टीकरण देने में वादी का असफल रहना, अतिरिक्त समय का आवेदन निर्धारित समय बीत जाने के बाद करना तथा इसके लिए 'बगैर ब्याज के बैंक में पैसे फंसे रहने' जैसा निराधार कारण देना, समझौते की शर्तों के अनुपालन में वादी की अक्षमता का द्योतक है, जिससे उसकी 'मुस्तैदी एवं स्वेच्छा' की कमी प्रदर्शित होती है।"

कोर्ट ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि प्रतिवादियों ने निजी जरूरतों की खातिर बाद में उस सम्पत्ति को अपेक्षाकृत कम दाम पर बेचा। निश्चित अदायगी के विशेष निदान का आदेश देने से पहले प्रतिवादियों की व्यक्तिगत परेशानियों को भी एक कारण माना गया।

"यह तथ्य कि प्रतिवादी संख्या एक और दो ने निजी जरूरतों के कारण प्रतिवादी संख्या चार, पांच, छह और सात से यह जमीन 16 जनवरी 1991 को कम दाम पर बेची, वादी की उस दलील को निष्प्रभावी करता है कि वह समझौते के तहत शर्तों के अनुपाल के लिए मुस्तैद और इच्छुक था।"

इन तथ्यों के आधार पर शीर्ष अदालत ने अपील निरस्त कर दी।


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