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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अगर विधायिका ने कोई कमी छोड़ी है तो इसकी भरपाई का काम अदालतों का नहीं

LiveLaw News Network
10 Nov 2019 7:02 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अगर विधायिका ने कोई कमी छोड़ी है तो इसकी भरपाई का काम अदालतों का नहीं
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न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और हेमंत गुप्ता की पीठ ने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के नेवी (पेंशन) विनियमन, 1964 के एक विनियम की व्याख्या के खिलाफ अपील की सुनवाई करते हुए यह बात कही. पीठ ने कहा की विनियमन को पढने से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सेवा के तत्व ऐसे व्यक्तियों तक सीमित रहने चाहिए जिसने अपनी सेवा के 15 साल पूरे कर लिए हैं।

इस मामले (भारत संघ बनाम वीआर नानुकुट्टन नायर) में ट्रिब्यूनल ने कहा था कि चूंकि, आवेदनकर्ता को दिव्यांग होने के कारण सेवा से हटा दिया गया है इसलिए उसे सेवा तत्व के साथ पूरा विकलांग पेंशन पाने का अधिकार है।

पीठ ने 1953 में नालिनाख्या बाईसैक बनाम श्याम सुन्दर हालदा मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा : न्यायिक व्याख्या से, किसी क़ानून जिसमें नियम, विनियमन और निर्देश शामिल हैं, में शब्द नहीं जोड़े जा सकते ताकि उन विनियमनोंकी भाषा के सादे अर्थ को प्रभावी बनाया जा सके।

अगर विधायिका ने कोई कमी छोड़ दी है, तो यह अदालत की जिम्मेदारी नहीं है की वह विधायका की इच्छा का अनुमान लगाकर इसे पूरा कर दे. पर जहां अदालत को लगता है कि शब्द गलती से छूट गए हैं और अगर तरीके से अर्थ निकालने से कुछ वर्तमान शब्द अर्थहीन हो जाते हैं, तो उस स्थिति में अतिरिक्त शब्द जोड़ने की अनुमति होती है पर जो शब्द नहीं हैं उनको नहीं पढ़ा जाना चाहिए। अदालत को प्रावधानों की रचना इस तरह से करनी चाहिए की सन्दर्भ और क़ानून का उद्देश्य बचा रहे जिसमें प्रावधान होते हैं ताकि वे सार्थक बन सकें।

संबंधित प्रावधानों से तालमेल बैठाने की हमेशा ही कोशिश की जानी चाहिए ताकि क़ानून का उद्देश्य पूरा हो सके। इस तरह, यह संभव नहीं है कि विनियमन के विनियम 105B में क्वालिफाइंग सर्विस का पूरा होना पढ़ा जाए।



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