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लोक निर्माण निविदा प्रक्रिया में एससी/एसटी को आरक्षण देने के लिए केटीटीपी अधिनियम में संशोधन को कर्नाटक हाईकोर्ट ने सही ठहराया

LiveLaw News Network
4 Jan 2020 4:15 AM GMT
लोक निर्माण निविदा प्रक्रिया में एससी/एसटी को आरक्षण देने के लिए केटीटीपी अधिनियम में संशोधन को कर्नाटक हाईकोर्ट ने सही ठहराया
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने कर्नाटक ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक प्रोक्योर्मेंट्स (केटीटीपी) अधिनियम की धारा 6 में संशोधन कर लोक निर्माण निविदा प्रक्रिया में एससी/एसटी को आरक्षण देने के क़दम को सही ठहराया है और इस बारे में लोक निर्माण ठेकेदारों की याचिका ख़ारिज कर दी।

न्यायमूर्ति बी वीरप्पा ने विश्वनाथ एचएम की याचिका ख़ारिज कर दी। याचिका में इस संशोधन को क़ानून के बाहर बताया था। अदालत ने कहा कि यह संशोधन से याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ कोई भेदभाव नहीं होता है और न ही संविधान के भाग III के तहत उसके मौलिक अधिकारों की गारंटी पर कोई प्रतिबंध लगता है।

केटीपीपी अधिनियम 4.10.2000 से लागू हुआ। इसका उद्देश्य आम ख़रीद की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने और इसमें उत्तरदायित्व लाने के लिए किया गया है। राज्य सरकार ने सभी ख़रीद एजेंसियों को इस अधिनियम में हुए संशोधनों के अनुरूप निविदा की प्रक्रिया का अनुशरण करने को कहा है।

यह संशोधन निविदा प्रक्रिया में एससी/एसटी के लिए आरक्षण का प्रावधान करने के लिए किया गया है। संशोधन के तहत निविदा आमंत्रित करनेवाली अथॉरिटी ने निर्माण कार्य में अनुसूचित जाति के लिए 17.15% कार्य और अनुसूचित जनजाति के लिए 6.95% कार्य आरक्षित किए गए हैं और इनकी क़ीमत 50 लाख रुपए से अधिक नहीं होगी।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जो संशोधन हुए हैं उससे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन होता है और इस वजह से इसे निरस्त कर दिया जाना चाहिए।

यह दलील भी दी गई कि संशोधन मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और यह संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है और भेदभावपूर्ण और मनमाना है और इस वजह से यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है। संविधान के अनुरूप नहीं होने के कारण इसे निरस्त कर दिया जाना चाहिए। राज्य सरकार ने इस याचिका का विरोध किया।

राज्य सरकार ने अपनी दलील में कहा कि यह क़ानून सबको न्याय देने और कमज़ोर वर्गों विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के हितों को संविधान के अनुच्छेद 46 के तहत संरक्षित करता है।

अनुच्छेद राज्यों को ऐसा करने का अधिकार देता है ताकि इन वर्गों के लोगों के साथ सामाजिक न्याय हो सके और उनके शोषण को रोका जा सके। यह भी कहा गया कि इस संशोधन के माध्यम से ग़ैर बराबरी को कम किया गया है और कमज़ोर वर्गों को भी लाभ दिलाने की कोशिश की गई है ताकि सामाजिक-आर्थिक न्याय को वास्तविकता में बदला जा सके और उनके जीवन को गरिमापूर्ण बनाया जा सके। यह संशोधन इस वर्ग के लोगों के सामाजिक-आर्थिक विकास में सुधार लाने के लिए किया गया है।

यह भी कहा गया कि आर्थिक सशक्तिकरण एक मौलिक मानवाधिकार है और यह ग़रीबों, कमज़ोर वर्गों और दलितों और आदिवासियों के लिए जीवन के अधिकार, समानता और गरिमापूर्ण जीवन का हिस्सा है।

अदालत को यह निर्णय करना था कि यह संशोधन उचित है कि नहीं और कहीं यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 19(1)(g) और 21 का उल्लंघन तो नहीं करता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह संशोधन उचित है। कोर्ट ने कहा कि इस आरक्षण के ख़िलाफ़ दी गई दलील आकर्षक है पर वह इसको स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि इससे संविधान के भाग III में अनुच्छेद 12 और 35 के तहत जो अधिकार दिए गए हैं उसका उल्लंघन नहीं होता और इस तरह उसके मौलिक संरचना से छेड़छाड़ नहीं करता।

अदालत ने कहा कि कर्नाटक ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक प्रोक्योर्मेंट्स (केटीटीपी) अधिनियम, 2016 (कर्नाटक अधिनियम नम्बर 31/2017) जिसमें परिशिष्ट-A के अनुरूप धारा 6 जोड़ा गया है और कर्नाटक ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक प्रोक्योर्मेंट्स (संशोधन) नियम, 2017 जिसमें नियम 27(A) परिशिष्ट-B के तहत जोड़ा गया है, एससी को जो आरक्षण दिया गया है वह 17.15% से अधिक नहीं होगा और एसटी को दिया गया आरक्षण 6.95% से अधिक नहीं होगा।

ये आरक्षण उन्हें निर्माण कार्यों की निविदा में मिलेगा और इसकी क़ीमत ₹50,00,000/- से अधिक नहीं होगी। अदालत ने कहा कि ये संशोधन जायज़ हैं और ये संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 19(1)(g) और 21 का उल्लंघन नहीं करते।

वरिष्ठ वक़ील एसएम चंद्रशेखर और एच पवन चंद्र शेट्टी ने याचिकाकर्ता की पैरवी की जबकि एडिशनल एडवोकेट जनरल आर नटरज और एडवोकेट नीलोफ़र अकबर ने राज्य सरकार की पैरवी की।

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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