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भ्रष्टाचार के आरोपों पर सीबीआई जांच का आदेश देने वाले न्यायमूर्ति राकेश कुमार को फिर से न्यायिक काम सौंपा

LiveLaw News Network
2 Sep 2019 10:29 AM GMT
भ्रष्टाचार के आरोपों पर सीबीआई जांच का आदेश देने वाले न्यायमूर्ति राकेश कुमार को फिर से न्यायिक काम सौंपा
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पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने न्यायमूर्ति राकेश कुमार को न्यायिक काम वापस से सौंप दिया है। इससे पहले 29 अगस्त को उनसे सभी न्यायिक कार्य वापस ले लिए गए थे क्योंकि उन्होंने निचली न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोपों की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे।

इस संबंध में रविवार को एक नोटिस जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि न्यायमूर्ति राकेश कुमार 2 सितम्बर को कोर्ट नं. 13 में 10.30 बजे से लंच के समय तक सेवा मामलों की सुनवाई करेंगे। लंच के बाद, वह न्यायमूर्ति अंजनी कुमार शरण के साथ एक ही अदालत में, आंगनवाड़ी, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कराधान और एमवी कराधान और एमए कराधान के साथ राज्य कराधान से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए बैठेंगे।

पूर्व आईएएस अधिकारी के. पी. रमैया द्वारा भ्रष्टाचार के मामले में दाखिल अग्रिम जमानत याचिका से संबंधित एक मामले में, न्यायमूर्ति कुमार ने 28 अगस्त को अधीनस्थ न्यायपालिका में रिश्वत के आरोपों की सीबीआई जांच का निर्देश दिया था। यह मामला कथित रूप से मार्च 2018 में पहले ही निपटा दिया गया था।

इसके अलावा, न्यायमूर्ति राकेश ने न्यायिक प्रणाली में भ्रष्टाचार की स्थिति पर प्रकाश डाला और अपने HC के सहयोगियों के खिलाफ तीखी टिप्पणी की। न्यायमूर्ति कुमार ने देखा कि न्यायाधीश न्याय का प्रबंधन करने में 'विशेषाधिकारों का आनंद लेने' में अधिक रुचि रखते हैं और कहा कि "इस उच्च न्यायालय में भ्रष्टाचार एक खुला रहस्य है।"

उन्होंने न्यायाधीशों के बंगलों के नवीनीकरण के लिए करोड़ों की सार्वजनिक धनराशि के उपयोग, न्यायाधीशों के बच्चों को लाभ पहुंचाने और भाई-भतीजावाद के मामलों का उल्लेख किया। "यह देखा गया है कि कर्तव्य का निर्वहन करने के बजाय, हम विशेषाधिकारों का आनंद लेने में अधिक लिप्त हैं", उन्होंने टिप्पणी की।

इस आदेश के बाद हंगामा मच गया, पटना हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश ने अगले दिन, न्यायमूर्ति कुमार से सभी न्यायिक कार्य वापस ले लिए।

पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा जारी नोटिस में कहा गया है, "न्यायमूर्ति राकेश कुमार के समक्ष लंबित सभी मामले, जिनमें पूरे/भाग में सुने या अन्यथा सुने मामले, तत्काल प्रभाव से वापस लिए जाते हैं।"

इसके अलावा, उच्च न्यायालय की 11-न्यायाधीशों की खंडपीठ द्वारा न्यायमूर्ति कुमार के आदेश को 29 अगस्त को "निलंबित" कर दिया गया। मुख्य न्यायाधीश ए. पी. साही की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि, "न्यायमूर्ति कुमार ने उस अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत निर्णय लेकर सबसे गंभीर त्रुटि की, जो अधिकार क्षेत्र किसी भी कानून के तहत उनके लिए उपलब्ध नहीं था।"

पीठ ने आदेश की निंदा करते हुए कहा कि यह व्यक्तिगत एजेंडे से प्रेरित लगता है। "इस तरह का कदम उठाया जाना, निश्चित रूप से कुछ व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों का परिणाम प्रतीत होता है, जिसकी उत्पत्ति एक निजी पृष्ठभूमि में हो सकती है क्यूंकि जो कुछ कहा गया और कदम उठाया गया, जैसा कि पहले ही प्रिंट और सोशल मीडिया में दर्ज और रिपोर्ट किया जा चुका है, उसके पीछे का कारण प्रतिशोध के चलते गुस्सा दिखाई पड़ता है, वास्तविक सुधार नहीं। 'येलो पेज' प्रसिद्धि पाने के दृष्टिकोण से, आकाश में अचानक लगायी गयी यह छलांग, निर्णय के पीछे के उद्देश्यों में से एक प्रतीत होती है", पीठ ने टिप्पणी की।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि वह न्यायमूर्ति कुमार के आदेश में उत्पन्न चिंताओं के प्रति सचेत था और जहाँ उनका अपने द्वारा ली गयी शपथ के प्रति कर्त्तव्य था, वहीँ इस तरह के "दुर्भावनापूर्ण, संक्रामक, नीच और पूरी तरह से असंवेदनशील" भाषा के उपयोग को माफ़ नहीं किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति कुमार को 26 साल की वकालत के बाद वर्ष 2009 में न्यायाधीश नियुक्त किया गया था और वह वर्तमान में उच्च न्यायालय के दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश हैं। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उनका कार्यकाल 31 दिसंबर, 2020 तक है।

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