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JP मामला : सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जरुरत पड़ी तो होमबॉयर्स के हितों के सरंक्षण लिए कदम उठाएंगे

Live Law Hindi
17 July 2019 7:45 AM GMT
JP मामला : सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जरुरत पड़ी तो होमबॉयर्स के हितों के सरंक्षण लिए कदम उठाएंगे
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सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर साफ किया है कि अगर जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड मामले में NCLT में चल रही कार्रवाही में कोई हल नहीं निकलता है तो पीठ खुद लाखों होमबॉयर्स के हितों के सरंक्षण के लिए आदेश जारी करेगी।

इसके साथ ही पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार की इस दलील के बाद सुनवाई को 18 जुलाई के लिए टाल दिया कि 17 जुलाई को NCLT में मामले की सुनवाई है जिसमें इस मुद्दे का हल निकलने की उम्मीद है।

अदालत कर सकती है संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल
वहीं न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने इस दौरान एक नया प्रस्ताव तैयार कर दाखिल करने को कहा कि किस तरह होमबॉयर्स के हितों की रक्षा की जा सकती है। पीठ ने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर अदालत संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने अधिकार का प्रयोग कर कोई आदेश जारी कर सकती है।

केंद्र से होमबॉयर्स के लिए यूनिफार्म प्रस्ताव लाने को कहा गया था
गौरतलब है कि इससे पहले 9 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा था कि वो उन लाखों होमबॉयर्स के सामने आने वाली कठिनाइयों को हल करने के लिए सभी मामलों के लिए एक यूनिफॉर्म प्रस्ताव लेकर आए जिन्हें बिल्डरों को भारी मात्रा में पैसा देने के बावजूद अभी तक फ्लैटों पर कब्जा नहीं मिला है।

जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड से संबंधित होमबॉयर्स मामले की सुनवाई कर रही शीर्ष अदालत ने कहा था कि उसे इस मुद्दे पर लाखों फ्लैट खरीदारों की चिंता है और केंद्र को इसे हल करने के लिए एक प्रस्ताव देना चाहिए।

अदालत ने सुझाव मांगते हुए जताई थी IBC के अंतर्गत कुछ कर सकने में असमर्थता
न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी ने कहा, "हम भारत सरकार से ऐसे सुझाव चाहते हैं जो ऐसे सभी मामलों के लिए समान हो सकते हैं।" पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल माधवी दीवान से कहा, "यह मुद्दा लाखों होमबॉयर्स को परेशान कर रहा है। IBC (इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड) के भीतर हम कुछ नहीं कर सकते। लेकिन इसके बाहर आप (केंद्र) कुछ सुझाव दे सकते हैं। हम इस पर विचार कर सकते हैं।"

किस मामले में सुनवाई करते हुए अदालत ने मांगे थे सुझाव१
पीठ ने यह उस याचिका पर सुनवाई करते हुए ये कहा जिसमें कहा गया है कि जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड (JIL) को परिसमापन में नहीं भेजा गया है, हालांकि कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रक्रिया की समय सीमा समाप्त हो गई है और इससे हजारों घर खरीदारों को "अपूरणीय नुकसान" होगा।

"प्रक्रिया के इतर क्या कुछ सुझाव दिए जा सकते हैं१"
ASG ने अदालत से यह कहा कि इस याचिका का जवाब देने का उचित अधिकार प्रस्ताव पेशेवर या संबंधित बैंक है लेकिन पीठ ने पूछा कि चल रही प्रक्रिया को विचलित किए बिना भारत सरकार द्वारा कुछ अन्य व्यवस्था का सुझाव दिया जा सकता है? हम यह जानना चाहते हैं कि क्या आपके पास सुझाव देने के लिए कुछ है? पीठ ने कहा कि नीतिगत मुद्दे को केंद्र सरकार द्वारा हल किया जाना है।

हुआ था JIL के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का आदेश
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 9 अगस्त को JIL के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का आदेश दिया था और फर्म, इसकी होल्डिंग कंपनी और प्रमोटरों को नए सिरे से बोली प्रक्रिया में भाग लेने से रोक दिया था।

RBI को मिली थी बैंकों को निर्देश देने की अनुमति
इसके साथ ही पीठ ने भारतीय रिजर्व बैंक को IBC के तहत JIL की होल्डिंग कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL) के खिलाफ कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन कार्यवाही (CIRP) शुरू करने के लिए बैंकों को निर्देश देने की भी अनुमति दी थी।

इसमें ऐसा कहा गया था कि "संदेह की कोई गुंजाईश नहीं" है कि JAL और JIL के पास अधूरी आवासीय परियोजनाओं को पूरा करने के लिए वित्तीय क्षमता और संसाधनों की कमी है जिससे 21,000 से अधिक घर खरीदारों को तब तक उनके फ्लैटों का कब्जा नहीं दिया गया है।

ताज़ी याचिका में मांगा गया निर्देश
शीर्ष अदालत में दायर की गई ताजा याचिका में यह निर्देश मांगा गया है कि JIL के "स्वतंत्र और पूरी तरह से फोरेंसिक ऑडिट" को इसके निगमन की तारीख से आयोजित किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत के पिछले साल के आदेश का हवाला देते हुए दलीलों में कहा गया है कि अदालत ने जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड के परिसमापन से बचने के लिए एक सचेत प्रयास किया था। हालांकि फैसले के पारित होने के बाद सामने आई घटनाओं ने निराशा पैदा की है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, CIRP को पूरा करने के लिए 270 दिनों का समापन 6 मई को हो चुका है।

याचिका में यह कहा गया है कि अब तक लेनदारों की समिति द्वारा केवल दो गंभीर बोलियां प्राप्त की गई हैं। एक बोली नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा प्रस्तुत की गई है जबकि दूसरी सुरक्षा ARC द्वारा प्रस्तुत की गई है। उक्त बोलियों में से कोई भी समिति द्वारा स्वीकार नहीं की गई है। जेआईएल परिसमापन में जा रहा है और प्रत्येक गुजरते दिन के साथ एक वास्तविकता में बदल रहा है।

याचिका में यह कहा गया है कि यदि 6 मई तक कोई योजना स्वीकार नहीं की जाती है तो JIL स्वचालित रूप से परिसमापन में चला जाएगा और हजारों घर खरीदारों को बिना किसी उपाय के छोड़ दिया जाएगा। JIL के फॉरेंसिक ऑडिट की मांग करते हुए यह आरोप लगाया गया है कि आम्रपाली ग्रुप ऑफ़ कंपनीज द्वारा विकसित परियोजनाओं की तुलना में वर्तमान मामले में बहुत बड़े पैमाने पर धन का डायवर्जन किया गया है।


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