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क्या यह अदालत का अपमान नहीं है? जस्टिस मिश्रा ने भूमि अधिग्रहण मामले में खुद को सुनवाई से दूर रखने की मांग पर दी प्रतिक्रिया

LiveLaw News Network
15 Oct 2019 3:38 PM GMT
क्या यह अदालत का अपमान नहीं है? जस्टिस मिश्रा ने भूमि अधिग्रहण मामले में खुद को सुनवाई से दूर रखने की मांग पर दी प्रतिक्रिया
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अखिल भारतीय किसान संघ ने 14 अक्टूबर को एक पत्र लिखा था, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अनुरोध किया कि न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली नवगठित संविधान पीठ भूमि अधि‍ग्रहण में उचि‍त मुआवजा एवं पारदर्शि‍ता का अधि‍कार, सुधार तथा पुनर्वास अधिनि‍यम, 2013 की धारा 24(2) की व्याख्या के बारे में मामलों की सुनवाई नहीं कर सकती।

अपने अध्यक्ष के माध्यम से एसोसिएशन ने अनुरोध किया था कि न्यायमूर्ति मिश्रा पीठ का नेतृत्व नहीं कर सकते क्योंकि उन्होंने पहले ही 2018 के फैसले में 2014 के फैसले की सटीकता पर संदेह जताकर मुद्दे पर अपने विचार व्यक्त किए थे। संविधान पीठ के सामने आए पांच मुद्दों में से एक को जे मदन लोकुर ने आगे बढ़ाया था, जो 2014 के फैसले का हिस्सा थे। उन्होंने कहा था कि वह 2018 के फैसले से सहमत नहीं थे।

जस्टिस अरुण मिश्रा ने उन्हें इस सुनवाई से हटाए जाने की मांग पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "हम सभी कभी न कभी मुद्दे से जुड़े रहे हैं। मुझे बताइए, कौन इसका हिस्सा नहीं रहा है? तो क्या हम सभी मुद्दे पर सुनवाई करने के लिए अयोग्य हो गए? हम सिर्फ यह जानना चाहते हैं कि विधि सम्बधित सवाल क्या है? यह सम्पत्ति का सवाल नहीं रहा। यह एक वैधानिक मुद्दा है। हम इस पर सुनवाई करना चाहते हैं या नहीं चाहते, यह सवाल नहीं है।"

उन्होंने आगे कहा,

"क्या यह अदालत अपमान नहीं है? यदि आपने इसे मुझ पर छोड़ा होता, तो मैंने फैसला किया होता। मेरे चैम्बर में आइए और मैं बताऊंगा कि मैं क्या करता। लेकिन आप मुझे बदनाम करने के लिए इस मुद्दे को सोशल मीडिया पर ले जा रहे हैं। कौन जिम्मेदार है? क्या यह अदालत का माहौल हो सकता है? यह इस तरह नहीं हो सकता ... मुझे एक कोई जज बताएं जिसने इस मुद्दे पर कोई विचार व्यक्त नहीं किया है, तो हम सभी अयोग्य हैं? क्या सभी को इस तरह से बदनाम किया जा सकता है? "

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भी जज के समर्थन आए और उन्होंने कहा,

"एक, पक्षपात का दावा न केवल पीठ के मुख्य अधिकारी बल्कि पीठ के अन्य सदस्यों को भी दुखी करता है क्योंकि उनके विचार भी भिन्न हो सकते हैं।

... दो, गोलकनाथ मामले में मुख्य निर्णय जस्टिस सीकरी और शेलत द्वारा दिया गया था कि मौलिक अधिकारों से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। जब वे बाद में केशवानंद भारती मामले में पीठ पर बैठे, तो उन्होंने अपना विचार बदल दिया ...

तीन, अभी हम एक खंड की शुद्ध व्याख्या पर हैं, पुणे नगर निगम या इंदौर विकास प्राधिकरण के केस के विवरण को जाने के बिना ... और चार, यहां कोई माननीय न्यायाधीश नहीं है, जिन्होंने इस मुद्दे पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।"

"मैं यह नहीं कह रहा हूं कि न्यायाधीश को कानूनी सिद्धांत के अनुसार पुनर्विचार करना चाहिए ... मैं केवल यह कह रहा हूं कि आप इस पर फैसला कर सकते हैं ... हम इसे आप पर छोड़ देते हैं", वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने कहा।

जस्टिस मिश्रा ने टिप्पणी की,"आप औचित्य के बारे में बात कर रहे हैं ... तो यह अनुरोध सोशल मीडिया पर ले जाने से पहले मेरी बेंच के सामने नहीं किया गया?"

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